Shailesh Matiani birth anniversary : संघर्ष व अभावों में गुजरा जीवन, गोश्‍त तक का करना पड़ा था प्‍यापार

Shailesh Matiani birth anniversary देवभूमि का एक ऐसा लेखक जिसकी रचनाओं में पहाड़ की पीड़ा के साथ भूख स्त्री और मौत का मार्मिक चित्रण है। ऐसे महान लेखक शैलेश मटियानी को लेकर सरकार व अन्य लेखकों का रवैया हमेशा उपेक्षापूर्ण रहा।

Skand ShuklaThu, 14 Oct 2021 07:22 AM (IST)
Shailesh Matiani birth anniversary : संघर्ष व अभावों में गुजरा जीवन, गोश्‍त तक का करना पड़ा था प्‍यापार

गणेश जोशी, हल्द्वानी : Shailesh Matiani birth anniversary : देवभूमि का एक ऐसा लेखक जिसकी रचनाओं में पहाड़ की पीड़ा के साथ भूख, स्त्री और मौत का मार्मिक चित्रण है। ऐसे महान लेखक शैलेश मटियानी को लेकर सरकार व अन्य लेखकों का रवैया हमेशा उपेक्षापूर्ण रहा। अभावों व संघर्षों के बीच पले-बढ़े मटियानी ने 51 वर्ष की साहित्यिक जीवन यात्रा में 30 उपन्यास समेत अलग-अलग विधाओं में 97 से अधिक रचनाएं लिखी। उनका जन्म अल्मोड़ा के बाड़ेछीना में 14 अक्टूबर 1931 को हुआ था। जब वह 14 वर्ष के थे, तब सिर से माता-पिता का साया उठ गया था। मटियानी का जीवन संघर्षमय हो गया। अल्मोड़ा पहुंचे, वहां भी चाचा के साथ गोश्त के व्यापार में हाथ बंटाने लगे।

ऐसे शुरू हुई साहित्यिक यात्रा

मटियानी के चचेरे भाई नेवी में थे। उनकी रचनाएं नेवी की पत्रिकाओं में छपती थी। शैलेश मटियानी उनकी कविताएं पढ़कर प्रेरित हुए। खुद भी लिखना शुरू कर दिया। जब अल्मोड़ा में उनकी रचनाएं नहीं प्रकाशित हुई तो उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका रंगमहल व अमर कहानी में भेजनी शुरू की और प्रकाशित भी होने लगी। संघर्ष करते हुए वह दिल्ली पहुंचे। वहां से इलाहाबाद, मुंबई होते हुए अंतिम समय हल्द्वानी पहुंचे। 24 अप्रैल 2001 को उनका निधन हो गया। उन्होंने 30 उपन्यास, 28 कहानी संग्रह, नौ लोककथा संग्रह, 16 बाल कथा संग्रह, एक एकाकी संग्रह, 13 निबंध संग्रह की रचना की।

ऐसे बदल गया नाम

कुमाऊं विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोध अध्येता अरविंद कुमार मौर्य ने बताया कि बचपन में इनका नाम रमेश चंद्र मटियानी था। बाद में इन्होंने शैलेश जोड़ लिया था, और इन्हें शैलेश मटियानी नाम से ही पहचाना जाने लगा।

अंतिम समय तक चलती रही संघर्ष यात्रा

मटियानी पर गहन अध्ययन करने वाले अरविंद मौर्य बताते हैं, कागज की खेती करने वाला यह खेतीहर अंतिम समय तक अस्मिता के लिए संघर्ष करता रहा। मटियानी का साहित्य संसार कुमाऊं की हरी-भरी वादियों से लेकर मुंबई के विशाल समुद्र तट तक फैला है। इसमें पहाड़ की वादियां, संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज, लोक संसार शामिल हैं। उनकी कहानी मैमूद हो या फिर पहला उपन्यास दोराहा। इसके अलावा बोरीवली से बोरबंदर व कबूतरखाना उनका प्रसिद्ध उपन्यास है। मौर्य कहते हैं, दुर्भाग्य है कि आज तक इनका स्मारक तक नहीं बन सका। नई पीढ़ी को उनके साहित्य रचना से अवगत कराने के लिए माटियानी साहित्य पीठ स्थापित करने की जरूरत है।

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