पर्यावरण बचाने के साथ आत्मनिर्भर बनने की राह पहाड़ की महिलाएं ही निकाल सकती हैं, गजब है इनकी कहानी

पर्यावरण बचाने के साथ आत्मनिर्भर बनने की राह पहाड़ की महिलाएं ही निकाल सकती हैं, गजब है इनकी कहानी
Publish Date:Tue, 14 Jul 2020 11:39 AM (IST) Author: Skand Shukla

अल्मोड़ा, दीप सिंह बोरा : पहाड़ की रीढ़ यानी मेहनतकश महिलाएं अब गांवों में आत्मनिर्भरता की इबारत लिख रहीं हैं। अल्मोड़ा जिले की बल्टा गांव की मातृशक्ति ने आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की है। वनाग्नि से बेजार गांव के जंगल को लपटों से बचाने के लिए वह न केवल पीरूल का निस्तारण कर रहीं है बल्कि उसे प्लांट तक पहुंचाकर बिजली तैयार करने लगी हैं। खास बात कि बल्टा गांव में देश दुनिया का यह पहला अवनी बायोमास प्लांट है जिसे केवल नारीशक्ति चला रही है। यहां उत्पादित बिजली को ऊर्जा निगम खरीदेगा। वहीं वन विभाग पीरूल की कीमत अदा करेगा। गांव की 14 महिलाएं सीधे प्लांट जुड़ी हैं, जबकि 29 को पीरूल एकत्रीकरण के बहाने स्वरोजगार मिल गया, सो अलग।

ऐसे तैयार करेंगे बिजली

चीड़ की पत्तियां यानी पीरूल को गैसीफायर में जलाएंगे। उत्पन्न गैस को कूलिंग सिस्टम में ठंडा कर फिल्टर के जरिये शुद्ध गैस इंजन तक पहुंचेगी। तब बिजली पैदा होगी। 25 किलोवाट प्रति घंटा क्षमता वाले प्लांट में तैयार बिजली ऊर्जा निगम 7.54 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदेगा। वहीं आपातकाल के लिए बिजली का बेहतर स्टॉक भी रहेगा।

 

नायाब मॉडल सरकार की नीति में शामिल

हिमालयी राज्य में अब तक 10 पीरूल प्लांट स्थापित कर चुकी अवनी बायोमास एनर्जी लिमिटेड बेरीनाग (पिथौरागढ़) के संस्थापक सदस्य व निदेशक रजनीश जैन ने बल्टा गांव की महिलाओं के जुनून को देख यहां इकाई लगाई। तकनीकी मदद दी। बल्टा के मॉडल को देख राज्य सरकार ने पीरूल प्लांट को बाकायदा अपनी नीति में शामिल कर लिया है।

 

गांव में रोजगार मिलना बड़ी बात

अवनी पलायन रोको बल्टा गांव समूह की अध्यक्ष तारा देवी ने बताया कि हमें आत्मर्निभर बनाने में अवनी समूह की भूमिका रही। वह पीरूल का दो रुपया और वन विभाग एक रुपया प्रति किलो मूल्य हमें दे रहा। प्लांट लगने से पीरूल यहीं खपेगा। अवनी के लोग हमें बिजली बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रबंधक गीता देवी ने बताया कि गांव में ही रोजगार मिल गया है। सबसे बड़ा लाभ जंगल को मिलेगा। पीरूल ही नहीं रहेगा तो आग भी नहीं लगेगी। प्लांट में अभी 14 महिलाएं काम कर रहीं।

 

बिजली बनाने का ले रहे प्रशिक्षण

प्लांट से जुड़ी हेमा देवी का कहना है कि साल भर से समूह की महिलाओं ने मिलकर प्लांट स्थापित करने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की है। मजदूरी के बाद अब सुकून मिल रहा है। हमें स्वरोजगार मिल गया। जंगल भी बचेंगे। लीला देवी ने बताया कि हमने लॉकडाउन में भी मेहनत मजदूरी की। श्रमदान कर पत्थर और प्लांट के मशीन ढोए। अब जानकारों के अधीन बिजली बनाने का प्रशिक्षण ले रहे हैं। बल्टा गांव से सीख ले अन्य गांवों की महिलाएं भी यह काम कर सकती हैं।

 

महिलाओं द्वारा संचालित इकलौता प्लांट

अवनी समूह के निदेशक व सहसंस्थापक रजनीश जैन का कहना है कि ग्रिड से जुड़ने वाला बल्टा में अवनी का 10वीं इकाई है। इससे पूर्व प्यूड़ा नैनीताल, चकोन गांव (उत्तरकाशी) में सात, पिथौरागढ़ व एक द्वाराहाट में एक-एक प्लांट लगा चुके। यह उत्तराखंड ही नहीं दुनिया का इकलौता प्लांट है जिसे केवल महिलाएं चला रहीं। अब हम पीरूल निस्तारण के बाद क्षेत्र के पर्यावरण में पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी करेंगे।

 

पीरूल प्लांट लगने से वनाग्नि की घटनाएं रुकेंगी

डीडी पांगती, ईई ऊर्जा निगम ने बताया कि महिला सशक्तिकरण के लिहाज से यह नायाब मॉडल है। महिलाएं स्वावलंबी बनेंगी। पीरूल प्लांट लगने से वनाग्नि पर काबू पाया जा सकेगा। बिजली खरीद का मूल्य बढ़ाने के मामले में नियामक आयोग ही फैसला लेगा। बल्टा में जो बिजली बनेगी, उसे खरीदने का अनुबंध हुआ है।

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