तल्लादेश में जहां नरभक्षी बाघिन का जिम कार्बेट ने किया था शिकार, पर्यावरण विद मुरारी ने उसे खोज लिया

प्रसिद्ध अंग्रेज शिकारी जिम कार्बेट ने चम्पावत विकास खंड के तल्लादेश में जिस नरभक्षी बाघिन (मैन इटर्स ऑफ तल्लादेश) को मार कर लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी उस ठौर (जगह) की पहचान कर ली गई है।

Skand ShuklaSat, 20 Nov 2021 01:41 PM (IST)
तल्लादेश में जहां नरभक्षी बाघिन का जिम कार्बेट ने किया था शिकार, पर्यावरण विद मुरारी ने उसे खोज लिया

विनोद चतुर्वेदी, चम्पावत : प्रसिद्ध अंग्रेज शिकारी जिम कार्बेट ने चम्पावत विकास खंड के तल्लादेश में जिस नरभक्षी बाघिन (मैन इटर्स ऑफ तल्लादेश) को मार कर लोगों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी उस ठौर (जगह) की पहचान कर ली गई है। यहां जिम कार्बेट की छठी गोली लगने के बाद बाघिन ने अंतिम सांस ली थी। मरने से पहले बाघिन 150 लोगों को निवाला बना चुकी थी। नरभक्षी बाघिन का शिकार करने में जिम के पसीने छूट गए थे। इसका उल्लेख स्वयं जिम कार्बेट ने अपनी पुस्तक टैम्पल टाईगर में किया है। जिम कार्बेट से जुड़े एतिहासिक स्थलों की खोज में जुटे प्रकृति प्रेमी एवं पर्यावरण विद बीसी मुरारी ने उस स्थल की पहचान की है जहां जिम ने मेन इटर्स ऑफ कुमाऊं के नाम से प्रसिद्ध नरभक्षी बाघिन का शिकार किया था।

अपनी खोज के बाद बीसी मुरारी ने दावा किया कि वर्ष 1929 में जिम कार्बेट ने चम्पावत से लगभग 40 किमी दूर तल्लादेश के ठूलाकोट ग्राम से एक किमी पश्चिम की तरफ गहरे नाले के पास आतंक का पर्याय बन चुकी नरभक्षी बाघिन को मारा था। यह स्थान अत्यंत दुर्गम पहाड़ी और घने जंगल में है। यहां जिम कार्बेट को नरभक्षी का शिकार करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। जिम कार्बेट की पुस्तक टैम्पल टाईगर का हवाला देते हुए बीसी मुरारी ने बताया कि बाघिन का शिकार करने के दौरान जिम का मुंह पूरा फूल गया था और उनकी एक आंख बंद हो गई थी। यहां तक कि उनका एक कान भी बंद हो गया था जिससे उन्हें सुनने में दिक्कतें हो रही थी।

जिम कार्बेट बाघ का पीछा करते-करते गिर गए और काफी कोशिश के बाद वह बांज की एक टहनी में बैठ गए। चार घंटे बाद होश आने पर उन्होंने पाया कि उनके नाक से मवाद व खून निकल रहा था। इससे उनको दर्द में भी थोड़ी राहत मिल रही थी। जब जिम कार्बेट पेड़ में बेहोश पड़े थे तो बाघिन भी कुछ ही दूरी पर घायल अवस्था में थी। जिम ने उल्लेख किया है कि उस वक्त उनकी स्थिति बहुत ही नाजुक थी। वह चल भी नही पा रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वह इस बाघिन को घायल अवस्था में ऐसे ही छोड़ देते हैं तो यह और अधिक खंूखार हो जाएगी।

लिहाजा वे अपनी जान की परवाह किए बगैर रात में ही जून (चन्द्रमा) के उजाले में जंगल की तरफ निकल पड़े तथा 18 घंटे तक बाघिन का पीछा करते रहे। जिम की गोली लगने से कई बार वह घायल हुई। अंतत: जिम कार्बेट की बंदूक से निकली छठी गोली ने उसका काम तमाम कर दिया। बाघिन को मारने के लिए जिम कार्बेट लगातार छह दिन तक तल्लादेश में रहे। बाघिन के अलावा उन्होंने तल्लादेश में ही दो अन्य बाघों को भी मारा था। ये दोनों बाघ नरभक्षी के साथ मिलकर इंसान का शिकार करते थे। जिनके बाद में नरभक्षी होने की पूरी संभावना थी।

टनकपुर से चूका होते हुए सीम के रास्ते तल्लादेश पहुंचे थे जिम

जिम कार्बेट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक टैम्पल टाईगर में लिखा है कि तल्लादेश में नरभक्षी बाघिन को मारने के लिए वे टनकपुर से चूका होते हुए सीम के रास्ते पहुंचे थे। उन्होंने कहा है कि इस दौरान उन्होंने अपने जीवन की सबसे कठिन चढ़ाई पार की थी। बीसी मुरारी ने बताया कि नरभक्षी का शिकार करने के लिए जिम ने जिन रास्तों का उपयोग किया वे उन्हीं रास्तों से होते हुए गए और जहां नरभक्षी बाघिन का शिकार किया गया था उस स्थान की खोज पूरी की। यह रास्ते इतने दुर्गम हैं कि आदमी खाली हाथ भी इन रास्तों को पार नहीं कर सकता, लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए जिम कार्बेट बंदूक के साथ मेन ईटर का पीछा किया। इस बाघिन ने 150 लोगों की जान ले ली थी और डुंगर सिंह की मदद से जिम कार्बेट ने इसका अंत किया।

एक साल का लग गया वक्त

जिस स्थान पर जिम कार्बेट ने नरभक्षी बाघिन को मारा था उस स्थल को ढूंढने में बीसी मुरारी को लगभग एक साल का समय लगा। इस अभियान में मुरारी के साथ उनके पुत्र शैलेश मुरारी, स्थानीय युवक अर्जुुन और स्व. डुंगर सिंह के 90 वर्षीय भतीजे प्रेम सिंह ने काफी मदद की। डुंगर सिंह तत्कालीन समय में जिम कार्बेट के साथ थे, और उन्होंने नरभक्षी बाघिन के शिकार में जिम की मदद की थी। मुरारी ने चम्पावत या चूका में जिम कार्बेट के नाम पर म्यूजियम बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि दोनों केंद्र जिम कार्बेट के इर्द गिर्द घूमते हैं। इससे जिले में पर्यटन को काफी अधिक बल मिलेगा।

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