कुमाऊं का कालापानी है चुकुम गांव, नदी और जंगल से घिरे ग्रामीण दशकों से कर रहे हैं विस्‍थापन की मांग

कोसी की बाढ़ से तबाह हो चुके रामनगर के चुकुम गांव के लोग इन दिनों भारी मुसीबत में हैं। सरकार के प्रतिनिधि से लेकर नेता प्रतिपक्ष समेत कई दिग्गज यहां पहुंच कर आश्वासन का मरहम लगाते दिखाई देने लगे हैं।

Skand ShuklaSun, 24 Oct 2021 09:31 AM (IST)
कुमाऊं का कालापानी है चुकुम गांव, नदी और जंगल से घिरे ग्रामीण दशकों से कर रहे हैं विस्‍थापन की मांग

रामनगर, जागरण संवाददाता : कोसी की बाढ़ से तबाह हो चुके रामनगर के चुकुम गांव के लोग इन दिनों भारी मुसीबत में हैं। सरकार के प्रतिनिधि से लेकर नेता प्रतिपक्ष समेत कई दिग्गज यहां पहुंच कर आश्वासन का मरहम लगाते दिखाई देने लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्‍य है कि ऐसी सांत्वना यहां को वाशिंदों को 1954 से दी जा रही है। करीब साढ़े सात सौ लोगों की आबादी वाले ग्रामीणों को ये बात बखूबी पता है कि उनके जख्‍मों पर मरहम लगाने के लिए नेता चुनावी साल होने के कारण पहुंच रहे हैं। वक्‍त गुजरने के साथ वह एक बार फिर उनकी समस्‍याओं से बेखबर हो जाएंगे, जैसा सालों से चलता आ रहा है।

चुकुम गांव यानी कुमाऊं का काला पानी, दुर्गम-दुश्वारियों के बीच बसा एक ऐसा गांव जो हर बारिश में कोसी की बाढ़ से अलग-थलग पड़ जाता है। जंगली जानवरों का जोखिम भी यहां हर वक्त रहता है। पहाड़ से चुनौतियों वाले इस उपेक्षित गांव के बच्चे कोसी नदी तैर कर स्कूल जाने को मजबूर हैं। लेकिन इनके दर्द को समझने वाला कोई नहीं। हर साल बारिश में बाढ़ की विभीषिका झेलना इनकी नियति है। जब बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाता है तो जहां प्रशासनक इनके घावों पर मरहम लगाने के लिए पहुंचता है।

आपदा में बह गए 25 घर और कई एकड़ खेत

बीते दिनों आई भयंकर आपदा में चुकुम गांव में 25 घर और कई एकड़ खेत फसल के साथ बह गए। देखते ही देखते ग्रामीणों की जिंदगी भर की कमाई उनकी आंखों के सामने कुछ घंटों में बर्बाद हो गई। जान बचाने के लिए उन्‍होंने जंगल का रुख किया। तिरपाल के नीचे बच्‍चों के साथ भूख और दहशत में रात गुजारी। चुनावी साल होने के कारण नेताओं के वादे बरस रहे हैं। प्रशासन जरूरत के सामान उन तक पहुंचा रहा है। लेकिन बर्बादी और तबाही का जो मंजर उन्‍होंने दशकों से देखा है, उससे उन्‍हें भविष्‍य की चिंता भी खाए जा रही है।

एक तरफ नदी तो दूसरी तरफ जंगल से घिरा है गांव

रामनगर से 25 किलोमीटर दूर 115 हेक्टेयर क्षेत्र में आजादी से पहले बसा चुकुम गांव बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह से वंचित है। एक ओर कोसी की बाढ़ से जान सांसत में तो दूसरी ओर जंगल से हिंसक जानवरों से मौत का मंडराता साया इनके जीवन को कितना भयावह बनाता है, इसकी कल्पना करते ही मन सिहर उठता है। यहां के ग्रामीण दशकों से तबाही और बर्बादी का मंजर देखते आ रहे हैं। विस्‍थापित करने की मांग लंबे समय से कर रहे हैं, लेकिन किसी भी सरकार इनकी समस्‍याओं को गंभीरता से नहीं लिया।

1954 से झेल रहे बाढ़ का दंश

ग्रामीण बताते हैं कि 1954 में आई बाढ़ से काफी जमीन कोसी के रौखड़ में तब्दील हो गई थी। वहीं 1993 की बाढ़ में 13 आवासीय मकान बाढ़ में समा गए थे। 2010 में 30 मकान बाढ़ की चपेट में आए थे। 2011 में आठ मकान जमींदोज हुए थे और कई एकड़ भूमि बाढ़ में समा गई थी। तब से लगातार हर बारिश में पल-पल मौत को सामने से देखना इनकी जैसे नियति बन गयी है। इस साल 19 अक्टूबर 2021 को आई बाढ़ ने तो कहर ही बरपा दिया। कच्चे और पक्के करीब 50 मकान कोसी की भेंट चढ़ गए। 1993 में जब बाढ़ आयी थी तब तत्कालीन जिलाधिकारी आराधना जौहरी चुकुम पहुंची थी। उन्होंने भी चुकुम को विस्थापन किए जाने की वकालत की थी।

विस्थापन की फाइल फांक रही है धूल

चुकुम के पूर्व प्रधान जस्सी राम बताते हैं कि 2010 की बाढ़ के बाद विस्थापन की कार्रवाई शुरू हुई थी। उस समय मामला अधर में लटक गया था। 2015-16 से सचिव वन एवं पर्यावरण उत्तराखंड के कार्यालय में विस्थापन की फाइल अटकी है। जिसमें ग्रामीणों को आमपोखरा रेंज के प्लाट नं 50 में विस्थापन किए जाने की बात है। चुकुम की भूमि वन विभाग को और आमपोखरा रेंज की भूमि राजस्व विभाग को हस्तातंरित होनी है, मगर छह साल से अधिक समय होने के बाद भी कोई गौर नहीं किया जा रहा करीब लगभग साढ़े सात सौ की आबादी वाले चुकुम के लोगों की आंखे विस्थापन की बाट जोहते-जोहते पथरा सी गई हैं।

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