चीन सीमा से लगी उच्‍च हिमालयी घाटियां फिर गुलजार होंगी, 15 अप्रैल से ग्रामीण करेंगे माइग्रेशन

चीन सीमा से लगी उच्‍च हिमालयी घाटियां फिर गुलजार होंगी, 15 अप्रैल से ग्रामीण करेंगे माइग्रेशन

सीमांत जिला पिथौरागढ़ में छह महीने बाद उच्‍च हिमालयी घाटियों के लिए ग्रामीणों का माइग्रेशन फिर शुरू होने वाला है। पंद्रह अप्रैल के बाद चीन सीमा से लगी व्यास और दारमा के ग्रामीण माइग्रेशन की तैयारी में हैं।

Skand ShuklaSat, 10 Apr 2021 06:20 PM (IST)

धारवचूला, संवाद सूत्र : सीमांत जिला पिथौरागढ़ में छह महीने बाद उच्‍च हिमालयी घाटियों के लिए ग्रामीणों का माइग्रेशन फिर शुरू होने वाला है। पंद्रह अप्रैल के बाद चीन सीमा से लगी व्यास और दारमा के ग्रामीण माइग्रेशन की तैयारी में हैं। मंडलायुक्त की पहल से उच्च हिमालयी मार्गों को दुरुस्त रखने के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर दी है।

प्रतिवर्ष व्यास के सात गांव कुटी, रोंगकोंग, नाबी, नपलच्यु, गुंजी, गब्र्यांग और बूंदी के ग्रामीण साल में दो माह माइग्रेशन करते हैं। अप्रैल और मई माह में ग्रामीण घाटियों से ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिए उच्च हिमालय को और अक्टूबर माह में उच्च हिमालय से घाटियों की तरफ आते हैं। इस दौरान ग्रामीण पूरे परिवार और जानवरों के साथ माइग्रेशन करते हैं। इस कारण माइग्रेशन के दौरान सड़क और पैदल दोनों मार्गों की आवश्यकता होती है। जानवरों को पैदल मार्ग से जाना पड़ता है।

वर्तमान में दारमा घाटी में तिदांग और व्यास घाटी में अंतिम गांव कुटी तक सड़क बन चुकी है। इस बीच दोनों मार्ग बर्फबारी और मार्ग चौड़ीकरण के कारण बाधित हैं। मार्ग बाधित होने से ग्रामीण माइग्रेशन केा लेकर चिंतित हैं। शुक्रवार को कुमाऊं आयुक्त अरविंद  ह्यांकी ने धारचूला में विभागीय अधिकारियों की बैठक लेते हुए मार्ग सहित खाद्यान्न, पेयजल आदि व्यवस्थाएं दुरु स्त करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने 25 अप्रैल तक बूंदी तक मार्ग तरह खोलने और बूंदी से छियालेख तक पैदल मार्ग को ठीक करने के निर्देश दिए हैं।

मंडलायुक्त के इस निर्देश के बाद माइग्रेशन करने वाले ग्रामीण उत्साहित हैं। दारमा के तेरह गांव और व्यास के सात गांवों के ग्रामीण 15 अप्रैल के बाद माइग्रेशन प्रारंभ करेंगे। गब्र्यांग निवासी योगेश गब्र्याल, गुंजी निवासी दीवान सिंह गुंज्याल आदि का कहना है कि ग्रामीणों को अपने गांवों में जाकर खेती करनी होती है। समय पर माइग्रेशन होने से समय पर खेती की बुआई होगी। सितंबर अंतिम सप्ताह से ग्रामीणों को फिर शीतकालीन प्रवास के लिए घाटियों की तरफ आना होता है।

 

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