उत्तरायणी सिर्फ पकवान खाने-खिलाने का त्योहार ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का है पर्व

उत्तरायणी ऋतु त्योहार है, जो खुद में नदियों के संरक्षण का संदेश समेटे हुए है।

सरयू नदी पार यानी बागेश्वर व पिथौरागढ़ जिले के लोग उत्तरायणी से पहली शाम आटा-गुड़ मिलाकर घुघते बनाते हैं। उत्तरायणी की सुबह घुघुते कौओ को खिलाए जाते हैं। चम्पावत अल्मोड़ा व नैनीताल जिले में उत्तरायणी की शाम घुघुते बनाए जाते हैं।

Publish Date:Thu, 14 Jan 2021 01:55 AM (IST) Author: Prashant Mishra

हल्द्वानी, गणेश पांडे। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश की क्रिया मकर संक्रांति कुमाऊं में उत्तरायणी व गढ़वाल मंडल में मकरैणी नाम से जानी जाती है। सौर चक्र में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलता है, इसलिए इसे उत्तरायणी कहा जाता है। लोक जनमानस के लिए उत्तरायणी ऋतु त्योहार है, जो खुद में नदियों के संरक्षण का संदेश समेटे हुए है।
कुमाऊं में सरयू नदी पार यानी बागेश्वर व पिथौरागढ़ जिले के लोग उत्तरायणी से पहली शाम आटा-गुड़ मिलाकर घुघते बनाते हैं। उत्तरायणी की सुबह घुघुते कौओ को खिलाए जाते हैं। चम्पावत, अल्मोड़ा व नैनीताल जिले में उत्तरायणी की शाम घुघुते बनाए जाते हैं। गुड़ मिश्रित आटे के खिलौने, तलवार, डमरू आदि के साथ घुघुतों को फूल और फलों की माला में पिरोकर बच्चे गले में डालकर कौओं को आमंत्रित करते हैं-
काले कौआ काले, घुघुती माला खाले।
ले कौआ बड़, मैंके दिजा सुनौंक घोड़।
ले कौआ ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल।
ले कौआ पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुरी।
ले कौआ तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार।

पौराणिक कथाओं में मिलते हैं प्रसंग
उत्तरायणी के संदर्भ में कई पौराणिक कथा प्रचलित हैं। लेखक चारु तिवारी के मुताबिक एक कहानी चंद राजाओं के समय की है। कहा जाता है कि राजा कल्याण चंद के पुत्र निर्भयचंद का अपहरण राजा के मंत्री ने कर लिया था। निर्भय को लाड़-प्यार से घुघुति कहा जाता था। मंत्री ने जहां राजकुमार को छुपाया था उसका भेद एक कौअे ने कांव-कांव कर बता दिया। इससे खुश होकर राजा ने कौओं को मीठा खिलाने की परंपरा शुरू की। दूसरी कथा के मुताबिक पुरातन काल में कुमाऊं में कोई राजा था। उसे ज्योतिषियों ने बताया कि उस पर मारक ग्रहदशा है। यदि वह मकर संक्रांति के दिन बच्चों के हाथ से कौओं को घुघुतों (फाख्ता पक्षी) का भोजन कराए तो उसके इस ग्रहयोग के प्रभाव का निराकरण हो जाएगा। कहते हैं राजा अहिंसावादी था। उसने आटे के प्रतीात्मक घुघुते तलवाकर बच्चों के हाथों कौओं को खिलाए। तब से यह परंपरा चल पड़ी। इस तरह की अन्य कथाएं भी मिलती हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन में जगाई थी चेतना
उत्तरायणी सांस्कृतिक उत्सव ही नहीं, लोक चेतना और संकल्पों को मजबूत करने वाला त्योहार है। उत्तरायणी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय जन चेतना की अलख जगाई थी। संस्कृति कर्मी व लेखक चारु तिवारी के मुताबिक 1916 में जब कुमाऊं परिषद बनी तो आजादी के आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। बड़ी संख्या में लोग कुमाऊं परिषद से जुडऩे लगे। अंग्रेजी शासन में कुली बेगार की प्रथा बहुत कष्टकारी थी। अंग्रेज जहां से गुजरते किसी भी पहाड़ी को अपना कुली बना लेते। उसके एवज में उसे पगार भी नहीं दी जाती। अंग्रेजों ने इसेे स्थानीय जनता के मानसिक और शारीरिक शोषण का हथियार बना लिया था। प्रतिकार की आवाजें उठने लगी थी।
सरयू में बहा दिए थे कुली रजिस्टर
कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को उत्तरायणी मेले में एकत्र जनमानस ने सरयू-गोमती का जल अंजली में लेकर कुली बेगार नहीं देने का संकल्प ले लिया था। कमिश्नर डायबिल बड़ी फौज के साथ वहां पहुंचा था। वह आंदोलनकारियों पर गोली चलाना चाहता था, लेकिन जब उसे अंदाजा हुआ कि अधिकतर थोकदार और मालगुजार आंदोलनकारियों के प्रभाव में हैं तो वह चेतावनी तक नहीं दे पाया। इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हो गया। हजारों लोगों ने कुली रजिस्टर सरयू में बहा दिए। इस आंदोलन के सूत्रधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल, विक्टर मोहन जोशी आदि प्रमुख थे।

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