उत्‍तराखंड में तीन सीएम बदल गए लेकिन नशाखोरी के खिलाफ नहीं उठाया कोई ठोस कदम

विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ गया और नेता चुनावी नशे में हैं। जनप्रतिनिधि युवाओं को नशे के दलदल में देख रहे हैं मगर बेफिक्र हैं। इधर सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने को है। तीन सीएम बदल गए लेकिन नशाखोरी के खिलाफ ठोस कुछ भी नहीं दिखा।

Skand ShuklaSun, 28 Nov 2021 10:03 AM (IST)
उत्‍तराखंड में तीन सीएम बदल गए लेकिन नशाखोरी के खिलाफ नहीं उठाया कोई ठोस कदम

जागरण संवाददाता, हल्‍द्वानी : विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ गया और नेता चुनावी नशे में हैं। जनप्रतिनिधि युवाओं को नशे के दलदल में देख रहे हैं मगर बेफिक्र हैं। इधर, सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने को है। तीन सीएम बदल गए लेकिन नशाखोरी के खिलाफ ठोस कुछ भी नहीं दिखा। शराब, गांजा, चरस, स्मैक, हेरोइन आदि घातक नशे का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। इसमें झुग्गी-झोपडिय़ों से लेकर पाश कालोनियों तक के बच्चे शामिल हैं। मानकों को धता बताते हुए शहरों में खुले नशामुक्ति केंद्र इसकी तस्दीक करते हैं। बेसुध सिस्टम के पास इनके आंकड़े तक नहीं। देहरादून में डीएम ने एसओपी तो बना ली, लेकिन बाकी जिलों में व्यवस्था बेहोश है। लोग यही कह रहे हैं कि अपना उत्तराखंड भी अब उड़ता पंजाब की तरह हो गया। अब सीएम पुष्कर सिंह धामी ने हर जिले में नशामुक्ति केंद्र खोलने की घोषणा की है। जबकि तीन साल से डा. सुशीला तिवारी अस्पताल में नशामुक्ति केंद्र खोलने की फाइल गायब में है।

ऐसे अस्पताल का लाभ ही क्या

सरकारी सिस्टम को हर कोई कोस रहा है। कोसने वालों में वो लोग भी शामिल हैं, जो खुद अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं। बात करते हैं राजकीय मेडिकल कालेज अल्मोड़ा की। जिसके जिम्मे अब बेस अस्पताल भी है। इससे पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें तब और बढ़ गई थी, जब हल्द्वानी से 25 वरिष्ठ डाक्टरों का तबादला अल्मोड़ा किया गया। कालेज प्रशासन ने जैसे-तैसे डाक्टरों की संख्या 47 कर दी थी। फिर भी मेडिकल कालेज को न ही नेशनल मेडिकल कमीशन से एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए मान्यता मिली और न ही वहां पर बेहतर इलाज मिल पा रहा है। यह घोर विडंबना है। तीन दिन पहले सांस की बीमारी के इलाज के लिए स्वजन पांच साल के बच्चे को बेस अस्पताल ले गए थे, लेकिन उसे हल्द्वानी सुशीला तिवारी अस्पताल ही रेफर कर दिया। जब यही करना था तो कालेज व अस्पताल बनने का क्या लाभ?

कर्मचारियों पर फेका चुनावी पासा

चुनाव जीतना है। इसके लिए कुछ भी करना पड़े, करेंगे। अन्य राजनीतिक दलों के साथ भाजपा ने भी यही रणनीति अपना ली है। विपक्षी दलों ने भी सपने दिखाने हैं, ताकि जनता अपने पक्ष में आए। सरकार को जनहित के निर्णय लेने हैं, जिससे कि एंटी इनकंबेंसी का माहौल न बने। इसी के साथ ही सरकार ने पांच साल से स्वास्थ्य बीमा को लेकर परेशान आंदोलनरत कर्मचारियों व पेंशनरों को लाभ देने की कोशिश है। सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम व एम्स की दरों में इलाज की सुविधा के आदेश कर दिए हैं। इससे राज्य के ढाई लाख कर्मचारियों व पेंशनरों को लाभ मिलेगा। अब यह देखना है कि इस लाभ को दिलाने के लिए सरकार कम समय में निजी अस्पतालों से किस तरह का करार करती है। क्योंकि आयुष्मान योजना से अभी चंद अस्पताल ही जुड़े हैं।

दावेदारों के निराले दावे

चुनावी तैयारियों के बीच राष्ट्रीय दलों में दावेदारी का खेल भी अजब-गजब का है। कुछ नेताओं की बात ही अजूबी है। ये नेता, ऐसे नेताओं को पछाड़ते हुए दिखने लगे हैं, जो पूरे पांच साल आम जन के सुख-दुख के साथी बने रहे। बरसाती मेंढक की तरह बाहर निकल आए हैं। स्टूडियो में खींची चमकदार फोटो के जरिये होर्डिंग-बैनर में चमक रहे हैं। बड़े नेताओं की गणेश परिक्रमा इनकी पहचान है। इन्होंने बायोडाटा जेब में लेकर देहरादून से लेकर दिल्ली की दौड़ लगा रखी है। यही नहीं इन्होंने कुर्ता-पायजामा भी सिलवा लिया है। पार्टी कार्यालयों में भी चक्कर बढ़ गए हैं। इस समय पूरे उत्तराखंड में यह नजारा आम है। भाजपा व कांग्रेस में चल रहे ऐसे माहौल से बेचारा जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में है। कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में पार्टी कार्यालय में उदास बैठे वरिष्ठ नेता कहने लगते हैं, चुपचाप बैठे रहो। तमाशा देखते रहो, नहीं तो मन खराब हो जाता है।

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