अनदेखी के चलते वीरान हो गयी कत्यूर काल की अनमोल धरोहर, चोपड़ा में है 23 मंदिरों का समूह

कुमाऊं के पर्वतीय जिलों की तरह रामनगर से 20 किलोमीटर दूर रामनगर-पाटकोट मार्ग में स्थित वन ग्राम चोपड़ा में बारहवीं सदी एक साथ कई मन्दिरो के समूह देखने को मिल जाएंगे। स्थानीय लोग इसे मन्दिरो के रूप में जानते है लेकिन पुरातत्व विभाग इन्हें वीरखम कहता है।

Prashant MishraFri, 11 Jun 2021 04:14 PM (IST)
यह ऐतिहासिक धरोहर पर्यटन के क्षेत्र में अपनी पहचान बना पाई न ही अध्यात्म जगत में।

जागरण संवाददाता, रामनगर : उत्तरखण्ड में स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने देखे जा सकते हैं। कत्यूरी राजवंश का जब तक शासन था उस दौरान इस कला के तहत ऐसे मन्दिर समूह बनाए गए जो आज तक अपनी आभा बिखेर रहे हैं। कुमाऊं के पर्वतीय जिलों की तरह रामनगर से 20 किलोमीटर दूर रामनगर-पाटकोट मार्ग में स्थित वन ग्राम चोपड़ा में बारहवीं सदी एक साथ कई मन्दिरो के समूह देखने को मिल जाएंगे। स्थानीय लोग इसे मन्दिरो के रूप में जानते है लेकिन पुरातत्व विभाग इन्हें वीरखम कहता है। यह ऐतिहासिक धरोहर पर्यटन के क्षेत्र में अपनी पहचान बना पाई न ही अध्यात्म जगत में। यह धरोहर उपेक्षा का दंश झेल रही है।

एक साथ 23 मन्दिरो का समूह

वन ग्राम की बसासत से पहले से ही यह मन्दिर एकांत में होना अपने आप मे हर किसी की जिज्ञासा को बढ़ावा देता है। क्योंकि चोपड़ा गांव से पूर्व वहां केवल जंगल था। इन सभी मंदिरों का आकार बहुत छोटा है। जिनकी लंबाई महज 1.97 मीटर से 1.15 मीटर तक है। इनके मध्य भाग में दो पंक्तियों का अभिलेख भी दर्ज है।

सल्ट क्षेत्र से आते थे कत्यूरो के वंशज

गांव के बुजुर्ग बताते है कि सल्ट क्षेत्र में कत्यूर राजाओं के वंशज पहले यहां आकर पूजा अर्चना किया करते थे। आज भी जागर ( देवताओं का आवाहन करने वाली पूजा) में आज भी मुंनगुरु का उल्लेख कर इस क्षेत्र का नाम लिया जाता है। सीतावनी से मात चार किलोमीटर दूर चोपड़ा गाँव में मंदिरों का यह समूह हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता नजर आता है।

2014 में पुरातत्व विभाग ने लिया संज्ञान

चोपड़ा गांव में 2014 में पुरातत्व विभाग अल्मोड़ा के अधिकारियों ने इस क्षेत्र का निरीक्षण करने के बाद इसे 12वीं सदी के वीरखम बताते हुए भारत सरकार को इन्हें संरक्षण में लेने का अनुरोध किया था। अल्मोड़ा पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय प्रभारी चन्द्र सिंह चौहान कहते है कि इन विरखमो के संरक्षण की कवायद शुरू की गई थी लेकिन भारत सरकार ने राज्य सरकार के प्रस्ताव की अस्वीकृत कर दिया।

ऐसे तो वीरान हो जाएगी ये ऐतिहासिक धरोहर

भारत सरकार द्वारा संरक्षण न किये जाने से चोपड़ा गांव के लोगो को गहरा झटका लगा है। अगर पुरातत्व विभाग इसे संरक्षित करता तो यह सीतावनी की तरह पर्यटन स्थल बनता ओर गांव में पर्यटन ब्यवसाय के नए रोजगार के द्वार जरुर ग्रामीण युवको के लिए खुलते।

कैसे पहुंचे इन मंदिरों तक

रामनगर पाटकोट सड़क मार्ग के मध्य गेवा पानी तक 18 किमी छोटे वाहनों से पहुँचा जा सकता है। गेवा पानी से एक किलोमीटर पैदल अथवा कच्चे मार्ग स्व सुगमता पूर्वक चोपड़ा गाँव पहुँचा जा सकता है।

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