घर में बरगद और पीपल के पौधे लगाकर सुमन ने लोगों की भ्रांतियों को तोड़ा

पीजी कॉलेज लोहाघाट में भूगोल विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं एनएसएस प्रभारी डा. सुमन पांडेय ने अपने आवासीय परिसर में दो बड़ और तीन पीपल के पौधे लगाकर लोगों से इस भ्रांति को तोडऩे की अपील की है।

Prashant MishraWed, 09 Jun 2021 04:22 PM (IST)
धारणा है कि बड़ और पीपल के पौधे नि:संतान लोग ही लगाते हैं। यह धारणा काफी गलत है।

संवाद सहयोगी, चम्पावत : मैदानी क्षेत्रों में जगह-जगह मिलने वाले बड़ (वट) व पीपल के पेड़ पर्वतीय क्षेत्रों में यदा कदा ही मिलते हैं। इसका कारण इन पौधों का ठंडे इलाकों में ग्रोथ न कर पाना और लोगों में कई तरह की भ्रांतियां होना है। लेकिन अब बदलते पर्यावरणीय परिवेश के कारण ये पौधे धीरे-धीरे पहाड़ में भी होने लगे हैं। इन पौधों के रोपण को लेेकर चली आ रही भ्रांतियों को भी दरकिनार कर लोग अपने घरों के आस-पास इन्हें लगा रहे हैं। बावजूद इसके अभी भी बड़ और पीपल के पौधे लगाने वालों की संख्या नगण्य है।

बड़ और पीपल के पौधों को लगाने के लेकर समाज में प्रचलित धारणा के इतर पीजी कॉलेज लोहाघाट में भूगोल विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं एनएसएस प्रभारी डा. सुमन पांडेय ने अपने आवासीय परिसर में दो बड़ और तीन पीपल के पौधे लगाकर लोगों से इस भ्रांति को तोडऩे की अपील की है। उन्होंने लोहाघाट स्थिति पीडब्ल्यूडी कालोनी के अपने आवासीय परिसर में बड़ और पीपल के पौधे लगाए हैं, जो ग्रोथ भी कर रहे हैं।

डा. सुमन ने बताया कि पहाड़ के कुछ स्थानों में यह धारणा है कि बड़ और पीपल के पौधे नि:संतान लोग ही लगाते हैं। यह धारणा काफी गलत है। उन्होंने बताया कि हमारे शास्त्रों में पेड़ों को लगाने और उनकी पूजा करने का विधान है न कि पेड़ों को लगाने से रोकने का। उन्होंने बताया कि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं। शास्त्रों में कहा गया है कि पीपल और बड़ की पूजा करने से संपूर्ण देवता स्वयं पूजित हो जाते हैं। पीपल और बड़ का पौधा लगाने वाले की वंश पंरपरा कभी विनष्ट नहीं होती। उन्होंने लोगों से खाली जगह एवं मंदिरों के आस पास बड़ और पीपल का पौधा लगाने की अपील की है।

बड़ पीपल को लेकर है भ्रांति, पाला भी करता है नुकसान

जिले के अधिकांश स्थानों पर यह मान्यता है कि बड़ व पीपल के पेड़ वे ही लोग लगा सकते हैं जिनकी कोई संतान नहीं होती। किसी ने लगा भी लिया तो उसे शास्त्रों द्वारा निर्धारित किए गए पवित्रता संबंधी नियमों के पालन करना होता है। इन सब कारणों से बड़ और पीपल के पौधों को कोई आसानी से नहीं लगाता। खासकर पीपल का पेड़ लोग अपने घर के आस-पास नहीं लगाते। लेकिन दोनों पेड़ों की पूजा करने के लिए दूरस्त क्षेत्रों में जाते हैं। इसके अलावा पहाड़ में बर्फ गिरने और पाला पडऩे के कारण बड़ के पौधे नष्ट हो जाते हैं। पर्यावरण विद बीडी कलौनी ने बताया कि बड़ और पीपल के पौधे गर्म स्थानों पर ही ग्रोथ करते हैं। ठंडे इलाकों में उन्हें बर्फऔर पाले से बचाना मुश्किल होता है।

बरगद का धार्मिक महत्व

पर्यावरण के जानकार एडवोकेट नवीन मुरारी ने बताया कि हमारे धार्मिक शास्त्रों में वट वृक्ष की काफी महिमा बताई गई है। वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु व अग्रभाग में शिव का वास माना गया है। अखंड सौभाग्य एवं आरोग्य के लिए इस वृक्ष की पूजा की जाती है। वट सावित्री के दिन महिलाएं पति, बच्चों और परिवार की सुख समृद्धि के लिए वट की विशेष पूजा करती हैं।

आयुर्वेद में भी बरगद के पेड़ का महत्व है। इस पेड़ के फल, जड़, छाल, पत्ती सभी औषधि के रूप में प्रयुक्त होते है। बताया कि वट वृक्ष में वायुमंडल में कार्बनडाईऑक्साइड ग्रहण करने और ऑक्सीजन छोडऩे की अत्यधिक क्षमता होती है। इसकी जड़ के नीचे बैठकर ऋषि मुनि ध्यान साधना और पुराणों की रचना करते थे। आज भी लोग इसकी ठंडी छांव में बैठकर थकान दूर करते हैं।

ज्योतिषाचार्य पंडित रेवाधर कलौनी ने बताया कि हमारे ऋषि मुनियों और पुराणों ने बरगद के वृक्ष को काफी महत्पूर्ण मानते हुए उसकी पूजा का विधान किया है। यजुर्वेद, अथर्ववेद, रामायण, महाभारत, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, महोपनिषद, मनु स्मृति, रामचरित मानस आदि ग्रंथों में इसकी महिमा का उल्लेख है। धार्मिक महत्व के साथ यह पर्यावरण संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है। जेठ मास की आमावास्या को की जाने वाली वट सावित्री की पूजा इसका प्रमाण है।

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