नए गाने के साथ ड्रेस के कारण चर्चा में आए युवा गायक अनिल रावत, जानिए क्‍या कह रहे हैं लोग

लोकगायिका माया उपाध्‍याय के साथ अनिल रावत का नया गाना सुर्खियां बटोर रहा है। लेकिन अनिल अपने गाने से ज्यादा उसमें पहने ड्रेस के कारण चर्चा में है। दरअसल कुमाऊंनी गीत रधुली में अनिल रंगवाली पिछौड़ा से मिलते-जुलते कपड़े का वास्कट व टोपी पहने नजर आ रहे हैं।

Skand ShuklaThu, 05 Aug 2021 08:22 AM (IST)
नए गाने के साथ ड्रेस के कारण चर्चा में आए युवा गायक अनिल रावत, जानिए क्‍या कह रहे हैं लोग

गणेश पांडे, हल्द्वानी : उभरते युवा गायक अनिल रावत आजकल चर्चा में हैं। लोकगायिका माया उपाध्‍याय के साथ उनका नया गाना सुर्खियां बटोर रहा है। लेकिन अनिल अपने गाने से ज्यादा उसमें पहने ड्रेस के कारण चर्चा में है। दरअसल कुमाऊंनी गीत रधुली में अनिल रंगवाली पिछौड़ा से मिलते-जुलते कपड़े का वास्कट व टोपी पहने नजर आ रहे हैं। इसे लेकर इंटरनेट मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। किसी ने इसे लोक संस्कृति के साथ मजाक बताया है तो कोई नए प्रयोग के जरिये संस्कृति को बढ़ावा देने की बात कह रहा है।

प्रतिक्रियाओं से पहले पिछौड़ा पर बात। पिछौड़ा कुमाऊंनी महिलाओं का पारंपरिक पहनावा है। आमतौर पर इसे सुहागिन महिलाएं मांगलिक, धार्मिक आयोजनों के दौरान ओढऩी के रूप में धारण करती हैं। विवाह समारोह में दूल्हा पक्ष की ओर से दुल्हन के लिए जाने वाले वस्त्रों में पिछौड़ा मुख्य है। अल्मोड़ा निवासी 24 वर्षीय अनिल ने पिछौड़ा के छींटदार कपड़े से वास्कट, टोपी पहनकर रधुली गीत में अभिनय किया है। प्रसिद्ध लोक गायिका माया उपाध्याय के साथ अनिल की जुगलबंदी में गीत शानदार बना है। वीडियो गीत में दोनों बीच-बीच में अभिनय करते भी नजर आ रहे हैं, मगर अनिल की पोशाक ने चर्चा को गीत के बजाय ड्रेस पर केंद्रित कर दिया है।

संगीत में तेजी से उभर रहे अनिल

अनिल का यह तीसरा गीत है। इससे पहले उन्होंने प्रसिद्ध लोकगायक नैन नाथ रावल के गीत जब जोलौ बरेली.. और छोरी लछिमा को नए अंदाज में गाया। इंटरनेट मीडिया पर गीत को काफी पसंद किया गया। अनिल ने भातखंडे संगीत संस्थान से संगीत में विशारद के साथ कुमाऊं विश्वविद्यालय से संगीत में परास्नातक किया है। अनिल ने बताया कि किसी गीत देखकर उन्हें इस तरह की ड्रेस का आइडिया आया।

शुभंकर में निहित है पिछौड़े की आत्मा

जानकारों की मानें तो पिछौड़ा की आत्मा कुमाऊंनी शुभंकर यानी शंख, लक्ष्मी, सूर्य, घंटी आदि में निहित हैं। जब तक पिछौड़े में यह न हों पिछौड़ा पूर्ण नहीं होता। यानी तब वह पिछौड़े का डिजाइन मात्र रह जाता है। लेखक विश्वंभर नाथ साह सखा ने अपनी किताब में पिछौड़ा की परंपरा पर विस्तार से लिखा है। जिसमें पंडित, साह व ठाकुर समाज की महिलाओं के लिए अलग-अलग पृष्ठभूमि के रंग के पिछौड़ा होने का उल्लेख किया है। पिछौड़े का रंग देखकर ही महिला की पहचान हो जाती थी।

गहराई लायक विषय नहीं : डा. जोशी

संस्कृतज्ञ डा. नवीन चंद्र जोशी कहते हैं कि पिछौड़ा को आमतौर पर सुहाग व देवी श्रृंगार के रूप में देखा जाता है। युवक द्वारा सिर व ऊपरी अंग पर इससे मिलता वस्त्र धारण करना बहुत गहराई से लेने वाला विषय नहीं है। हालांकि पुरुष अपनी पारंपरिक पोशाक ही धारण करे तो बेवजह के विवाद की गुंजाइश ही नहीं रहेगी।

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