जन-जन की भाषा है हिंदी, भारत की आशा है हिंदी, विश्व हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर चम्पावत में काव्य गोष्ठी

कूर्मांचल एंग्लो संस्कृत विद्यालय चम्पावत में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना मंच की ओर से काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान वरिष्ठ एवं उदयीमान कवियों ने समसामयिक विषयों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। बाल कवियों ने भी अपनी रचनाओं से हिंदी के उत्थान का संदेश दिया।

Prashant MishraMon, 13 Sep 2021 05:56 PM (IST)
कविता से हिंदी के व्यापक प्रचार प्रसार पर बल दिया।

जागरण संवाददाता, चम्पावत : विश्व हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर कूर्मांचल एंग्लो संस्कृत विद्यालय चम्पावत में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना मंच की ओर से काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान वरिष्ठ एवं उदयीमान कवियों ने समसामयिक विषयों पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। बाल कवियों ने भी अपनी रचनाओं से हिंदी के उत्थान के लिए कार्य करने का संदेश दिया।

शुभारंभ डा. भुवन चंद्र जोशी ने अपनी कविता-मजदूर की पूजा, दो जून की रोटी का जुगाड़, पल जाए परिवार, कुछ नगद कुछ उधार...,से की। डा. अजय रस्तोगी अविरल ने-हिंदी की सेवा को मिलकर, आरंभ तक अभियान करें, दिनचर्या में योजित करके, प्रतिदिन इसका गुणगान करें..., कविता से हिंदी की उपयोगिता एवं उसकी महत्ता को उजागर किया। भूपेन्द्र सिंह देव ताऊ ने-जीवन के हर रंग को, इस रंगमंच पर दिखा गए..., पुष्कर सिंह बोहरा ने-पाया मानव तन अनमोल, बंदे देखो आंखें खोल..., कविता प्रस्तुत की। डा. तिलक राज जोशी ने-अनुपम, अदभुत शब्द पिरोकर, पाती कोई भेज रहा..., डा. सतीश चंद्र पांडेय ने- नजरों में मोहब्बत और वाणी में मधुरिमा चाहिए, इंसान ने इंसानियत को पास रखना चाहिए..., सुभाष जोशी ने-सींची माटी बलिदानों से, उत्सर्ग किया प्राणों का, गाथा गाता है कण-कण, अपने अमर शहीदों का..., रचना से देश के शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए। विष्णु दत्त भट्ट सरल ने- विश्व पटल पर हिंदी ने पहचान बनाई, अपने गुण -गौरव की मधुमय ज्योति जलाई..., और हिमांशु जोशी ने-अपनी सीमा स्वयं ही हिंदी ने ली नाप, एक किनारे बैठी है इसीलिए चुपचाप..., कविता से हिंदी की सार्थकता एवं उसकी उपेक्षा पर प्रकाश डाला।

बाल कवि संस्कृति ने-देखो चली इठलाती हिंदी, लगकर माथे पर वो ंिबंदी, घर-घर जाकर बोलो हिंदी, मैं हूं हिंदी, मैं हूं हिंदी..., कविता प्रस्तुत की। सामश्रवा आर्य ने जन-जन की भाषा है हिंदी, भारत की आशा हैं हिंदी..., कविता से हिंदी के व्यापक प्रचार प्रसार पर बल दिया।

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