कोरोना काल में क्रियाकर्म करने के लिए भी स्वजनों को करना पड़ा इंतजार

मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार यानी अंत्येष्टि क्रिया हिंदुओं के सोलह संस्कारों में एक है। मृत शरीर अग्नि को समर्पित करने के बाद परिजनों द्वारा अस्थि विसर्जन व 13 दिनों तक क्रियाकर्म या श्राद्ध कर्म करना होता है।

Skand ShuklaMon, 31 May 2021 11:16 AM (IST)
क्रियाकर्म के लिए लेना पड़ा समय, घर के बजाय क्रियाशाला में श्राद्धकर्म कराने पहुंच रहे मृतक के स्वजन

गणेश पांडे, हल्द्वानी : मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार यानी अंत्येष्टि क्रिया हिंदुओं के सोलह संस्कारों में एक है। मृत शरीर अग्नि को समर्पित करने के बाद परिजनों द्वारा अस्थि विसर्जन व 13 दिनों तक क्रियाकर्म या श्राद्ध कर्म करना होता है। कोरोना काल में उपजी परिस्थितियों ने क्रियाकर्म के लिए पिछले दिनों इंतजार करने की नौबत ला दी। बाकायदा इसके लिए समय लेना पड़ा।

कर्फ्यू के कारण सार्वजनिक भोज पर रोक है। कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से भी लोग घर के नजदीक क्रियाकर्म करने से बच रहे हैं। ऐसे में मुखानी स्थित क्रियाशाला में श्राद्धकर्म करने वालों की संख्या आठ से दस गुना तक बढ़ गई। सामान्य दिनों में औसतन तीन से चार श्राद्धकर्म होते थे। मई में संख्या बढ़कर 25 से 30 पहुंच गई। क्रियाशाला सेवा समिति के अध्यक्ष एनबी गुणवंत का कहना है कि शारीरिक दूरी सुनिश्चित कराने के लिए अलग से टैंट भी लगाया गया है। एक बार में चार लोगों का श्राद्धकर्म करने की अनुमति होती है। व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग समय दिया जा रहा।

समिति निश्शुल्क उपलब्ध कराती है साग्रमी

जनसहयोग से चलने वाली क्रियाशाला सेवा समिति बर्तन, गर्म पानी, रसोईगैस आदि सामग्री निश्शुल्क उपलब्ध कराती है। पंडित स्वजनों को लाना होता है। गोदान के लिए नाममात्र की रसीद काटी जाती है।

महामारी ने बदल दिए नियम

कोरोना से ऐसे भी हालात पैदा हुए जब स्वजन की मौत के बाद घर के सदस्य कोरोना संक्रमित होने से आइसोलेशन में चले गए। ज्योतिषाचार्य डा. नवीन चंद्र जोशी बताया कि कई यजमानों के ऐसे फोन आए। आपातकाल को देखते हुए आइसोलेशन से बाहर आने के बाद तीर्थ में श्राद्धकर्म करने का विकल्प दिया गया। शास्त्रों में आपातकाल में नियमों में बदलाव का विधान बताया गया है। अध्यक्ष क्रियाशाला सेवा समिति एनबी गुणवंत ने बताया कि मई में श्राद्धकर्म करने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि से व्यवस्था में बदलाव करना पड़ा। परिसर को संक्रमण मुक्त रखना बड़ी चुनौती थी। अब संख्या कम होने लगी है।

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