तीन पीढिय़ों से कश्मीरी धान को सहेज रहा मेहता परिवार, थल के डुगरी गांव की महिलाएं सामूहिक रूप से करती हैं रोपाई

परंपरागत बीजों को बचाने के लिए मुहिम चला रहे लोगों के लिए अच्छी खबर है। जिले के थल तहसील के एक गांव के लोग एक शताब्दी पूर्व कश्मीर से लाए गए धान की प्रजाति को आज भी सहेजे हैं।

Prashant MishraSat, 17 Jul 2021 07:50 PM (IST)
कश्मीर के चरवाहे उत्तराखंड आते थे। इन्हीं के जरिये तमाम फसलों और फलों के बीज यहां पहुंचते थे

जागरण संवाददाता, थल (प‍िथौरागढ़ ) : विलुप्ति की कगार पर पहुंचे परंपरागत बीजों को बचाने के लिए मुहिम चला रहे लोगों के लिए अच्छी खबर है। जिले के थल तहसील के एक गांव के लोग एक शताब्दी पूर्व कश्मीर से लाए गए धान की प्रजाति को आज भी सहेजे हैं। ग्रामीण धान की इस प्रजाति को आज भी सामूहिक रोपाई के जरिये खेतों में लगाते हैं।

यूं तो कश्मीर और उत्तराखंड के बीच कोई सीधा संबध नहीं है, लेकिन एक जैसी भौगोलिक परिस्थिति और हिमालयी राज्य होने के चलते दोनों राज्यों में काफी समानताएं हैं। कुछ दशक पूर्व तक कश्मीर के चरवाहे उत्तराखंड आते थे। इन्हीं के जरिये तमाम फसलों और फलों के बीज यहां पहुंचते थे और यहां के बीज कश्मीर में फूलते-फलते थे। धीरे-धीरे संपर्क कम होने से कृषि बीजों का यह आदान प्रदान आज लगभग शून्य स्तर तक पहुंच गया है।

सीमांत जिले के कुछ गांवों में आज भी कश्मीर से दशकों पूर्व लाए गए कृषि बीज सुरक्षित हैं। इनमें चावल की कश्मीरी प्रजाति मुख्य है। कम पानी वाली जगहों पर भी आसानी से पैदा होने वाली धान की यह प्रजाति कई गांवों में आज भी लहलहाती है। थल क्षेत्र के डुंगरी गांव के गंगा सिंह मेहता के परिवार के पास इस प्रजाति का बीज अब तक सुरक्षित है। यह परिवार हरेला पर्व पर इस प्रजाति के बीजों से तैयार पौधों की रोपाई करता है। गंगा सिंह मेहता बताते हैं कि उनके दादा ने कश्मीरी धान की इस प्रजाति का बीज मंगाया था। कम पानी में भी तैयार हो जाने वाली इस प्रजाति का चावल सुस्वादु के साथ ही अच्छी पैदावार भी देता है। शुक्रवार को गांव की महिलाओं ने न्यौली, छपेली गाकर सामूहिक रू प से धान की रोपाई लगाई। अकेले गंगा सिंह का परिवार 40 नाली भूमि में धान की रोपाई लगाता है। गांव के अन्य परिवार भी इस बीज को सुरक्षित रखे हुए हैं।

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