तंत्र के गण : बागबान के हुनर से लौट रही गरीब चेहरों पर मुस्कान

डा. रमेश की छोटी सी पहल बापू की सोच को पहाड़ में साकार करती दिख रही।

लाकडाउन में कोरोना संक्रमण से बचाव के गुर बता ग्रामीणों संग खेतों में पसीना बहाने वाले इस प्रगतिशील बागबान को सुदूर गांवों के लोग डाक्टर साहब के नाम से पुकारते हैं। गरीब व शारीरिक रूप से अक्षम ग्रामीणों को बागवानी से जोडऩे का उसने जो बीड़ा उठाया।

Publish Date:Sat, 23 Jan 2021 07:41 PM (IST) Author: Prashant Mishra

अल्मोड़ा, दीप सिंह बोरा। वैश्वक महासंकट से उपजे हालातों को अवसर में बदलना तो कोई इस धरतीपुत्र से सीखे। कुशल बागबान व नित नए प्रयोग करने में महारत यह जुनूनी ग्रामीणों को बागवानी के जरिये आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा ही नहीं दे रहा बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाओं का लाभ भी दिला रहा। समय निकाल चौतरफा चुनौतियों से घिरे किसानों की समस्याओं का समाधान भी बखूबी कर लेता है। लाकडाउन में कोरोना संक्रमण से बचाव के गुर बता ग्रामीणों संग खेतों में पसीना बहाने वाले इस प्रगतिशील बागबान को सुदूर गांवों के लोग डाक्टर साहब के नाम से पुकारते हैं। गरीब व शारीरिक रूप से अक्षम ग्रामीणों को बागवानी से जोडऩे का उसने जो बीड़ा उठाया, परिणाम अब सुखद मिल रहे। कोरोनाकाल में प्रशिक्षित गरीब किसान अब बेहतर सब्जी उत्पादन के जरिये आत्मनिर्भर होने लगे हैं। उनकी आर्थिकी भी सुधर रही।

21वीं सदी के युवा भारत में महात्मा गांधी के विचार ग्रामीण विकास के लिहाज से जहां प्रासंगिक हैं, वहीं उनके विचारों को अपना कर उसी दिशा में कदम बढ़ाने वाले अब भी मौजूद हैं। इन्हीं में एक हैं उद्यान विशेषज्ञ एवं प्रगतिशील बागवान डा. रमेश सिंह बिष्ट। वह कहते हैं महात्मा गांधी ने सशक्त राष्ट्र के लिए ग्राम पंचायतों की मजबूती, समृद्धि व विकास को सर्वोपरि माना था। इसके लिए बापू उन्नत कृषि व किसानों की खुशहाली को मुख्य कारक बताते थे। डा. रमेश की छोटी सी पहल बापू की उसी सोच को पहाड़ में साकार करती दिख रही। अन्य लोगों को प्रेरणा भी दे रही।

कभी बाजार से खरीदते थे, अब खुद बेचने लगे सब्जियां

डा. रमेश ने अल्मोड़ा जनपद के चौखुटिया व स्यालदे ब्लाक पर ज्यादा फोकस किया। वहां बीते एक वर्ष में वह अब तक लगभग 700 ग्रामीणों को कृषि बागवानी से जोड़ चुके। इनमें करीब डेढ़ सौ लोग दिव्यांग भी हैं। डा. रमेश वैज्ञानिक तकनीक से खेती के साथ इन ग्रामीणों को पशुपालन के जरिये माली हालत सुधारने के लिए प्रेरित करने में जुटे हैं। बीते वर्ष वैश्विक महासंकट के चलते तीन माह संपूर्ण लाकडाउन में ही इन दो विकासखंडों के किसानों ने 10 लाख रुपये से च्यादा की सब्जियां बेची। वहीं पशुपालन के जरिये पांच लाख रुपये की आमदनी हुई। यह सिलसिला चल ही रहा है। अब डा. रमेश ग्रामीणों की मजबूती के लिए उन्हें द हंस फाउंडेशन व सीबीएम संस्था से जोड़ आर्थिकी सुधारने में जुटे हैं।

बोले ग्रामीण- अब हम भी सब्जी उत्पादक

चौखुटिया ब्लाक स्थित सुदूर पालंगबाड़ी गांव के दिव्यांग नरेंदर सिंह कहते हैं कि उनके जैसे तमाम ग्रामीण खेती नहीं करते थे। घर के आसपास ही खुद के खाने के लिए सीमित मात्रा में ही सब्जियां उगा लेते थे। तकनीकी रूप से फसलों की जानकारी भी नहीं थी। डा. रमेश ने क्षेत्र में

पालीहाउस लगवाए। उन्नत बीत भी उपलब्ध कराए। नरेंदर सिंह के अनुसार अब वह लोग कोरोनाकाल में खुद की जरूरत पूरा कर बाजार में सब्जियां बेचने लगे हैं। इससे आमदनी भी बढ़ी है।

12 परिवारों का समूह

पालंबाड़ी गांव में अब 12 परिवारों का समूह भी बना लिया है। डा. रमेश समय समय पर वैज्ञानिक तकनीक से सब्जी उत्पादन का तकनीकी प्रशिक्षण देने पहुंचते हैं। इसी ब्लाक के बगड़ी गांव निवासी दिव्यांग बालम सिंह, बिजरानी गांव के लाल सिंह भी अब बेहतर सब्जी उत्पादक बन गए हैं।

उद्यान विशेषज्ञ व प्रगतिशील बागवान डॉ. रमेश सिंह बिष्ट ने कहा कि किसी भी राज्य या देश की तरक्की तभी संभव है जब गांव और ग्रामीण खुशहाल होंगे। भारतवर्ष पुराकाल से ही कृषि व पशुपालन प्रधान रहा है। वर्तमान में गांवों को और समृद्ध बनाने के लिए वैज्ञानिक विकास को माइक्रो क्लाइमेटिक जोन के अनुसार तय करना होगा। नई तकनीक व पद्धतियों का लाभ अंतिम गांव तक पहुंचाना होगा। हमारा प्रयास सार्थक हो रहा है। जो खेत कभी बंजर थे, वहां सब्जी उत्पादन सुखद अनुभूति दे रहा।

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