चंद वंश की कुलदेवी हैं हिमालय पुत्री नंदा, जानिए क्‍या है देवी से जुड़ी मान्‍यताएं

नंदा देवी महोत्सव का इतिहास सदियों पुराना है। चंद वंश में राजा बाज बहादुर चंद के शासनकाल (1638-78) नंदा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाया गया। 1815 में तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल द्वारा नंदा की मूर्ति अल्मोड़ा के मल्ला महल से दीप चंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित कराई गई।

Skand ShuklaWed, 15 Sep 2021 08:22 AM (IST)
चंद वंश की कुलदेवी हैं हिमालय पुत्री नंदा, जानिए क्‍या है देवी से जुड़ी मान्‍यताएं

जागरण संवाददाता, नैनीताल : कुमाऊं में नंदा देवी महोत्सव का इतिहास सदियों पुराना है। चंद वंश में राजा बाज बहादुर चंद के शासनकाल (1638-78) नंदा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाया गया। 1815 में तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल द्वारा नंदा की मूर्ति अल्मोड़ा के मल्ला महल से दीप चंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित कराई गई। 1670 में उन्होंने ही मां नंदा का कुलदेवी के रूप में पूजन शुरू किया। 1690 में तत्कालीन राजा उद्योत चंद ने पार्वतीश्वर व उद्योग चंद्रेश्वर नामक दो शिवमंदिर, मौजूदा नंदा देवी मंदिर अल्मोड़ा में बनाए।

मान्यताओं के अनुसार एक दिन कमिश्नर ट्रेल नंदा देवी चोटी को जा रहे थे तो उनकी एकाएक आंखों की रोशनी चली गई। लोगों की सलाह पर उन्होंने मंदिर बनवाकर नंदादेवी की मूर्ति स्थापित की तो उनकी आंखों की रोशनी लौट आई। कहा जाता है कि राजा बाज बहादुर चंद के पूर्वजों को गढ़वाल में आक्रमण कर सफलता नहीं मिली तो बाज बहादुर चंद ने प्रण किया कि युद्ध में विजयी होने पर नंदा देवी को कुलदेवी के रूप में पूजन करेंगे। आदिशक्ति नंदा का पवित्र धाम उत्तराखंड को माना जाता है।

श्रीराम सेवक सभा से जुड़े आचार्य भगवती प्रसाद जोशी बताते हैं कि चमोली के घाट ब्लॉक में कुरड़ को नंदा का मायका व थराली के देवराड़ा को ससुराल कहा जाता है। हर साल पहाड़ की बेटियां ससुराल जाती हैं तो उसी तरह नंदा देवी भी छह माह ससुराल, छह माह मायके में रहती हैं। हिमालय पुत्री नंदा के सम्मान में कुमाढ़ गढ़वाल में मेले लगते हैं। देश के सर्वोच्च शिखरों में नंदा देवी पर्वत श्रृंखला अग्रणी है। उत्तराखंड के पहाड़ के लोग इस पर्वत को बहिन-बेटी मानते हैं।

जोशी के अनुसार वेदों में जिस हिमालय को देवात्मा के समान माना गया है, नंदा उसी की पुत्री हैं। आदि शक्ति नंदा को पूजने की परंपरा पहाड़ में सदियों पुरानी है। नंदा या पार्वती हिमालय पुत्री हैं। उनका ससुराल भी कैलास माना जाता है। गढ़वाल के पंवार वंश के साथ ही कत्यूरी वंश के दौरान भी नंदाराज यात्रा के प्रमाण हैं। इतिहासकारों के अनुसार नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश की भी ईष्टï देवी थी, इस वजह से नंदा को राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। नंदा को पार्वती की बहन के रूप में भी देखा जाता है, तो कहीं पार्वती का रूप माना गया है।

स्कंद पुराण के मानस खंड के अनुसार नंदा पर्वत के शीर्ष पर नंदा देवी का वास है। नंदा की उपासना के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में मिलते रहे हैं। जोशी के अनुसार गौरी के छह रूपों में पार्वती एक है व भगवती के छह रूपों में एक नंदा है। उत्तराखंडवासियों का जीवंत रिश्ता है। देश में किसी भी पर्वत से किसी क्षेत्र का इतना जीवंत रिश्ता नहीं होगा।

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