जासूसी के आरोप में पकड़े गए पाक नागरिक की सजा बरकरार, हाईकोर्ट ने हिरासत में लेने के दिए आदेश

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जासूसी करने के आरोप में पाकिस्तानी नागरिक आबिद अली उर्फ असद अली उर्फ अजीत सिंह निवासी लाहौर (पाकिस्तान) की रिहाई के मामले में बुधवार को सुनवाई की। न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने अपना निर्णय सुनाते हुए आबिद अली की सजा को बरकरार रखा है।

Skand ShuklaWed, 22 Sep 2021 12:10 PM (IST)
जासूसी के आरोप में पकड़े गए पाक नागरिक की सजा बरकरार, हाईकोर्ट ने हिरासत में लेने के दिए आदेश

नैनीताल, जागरण संवावाददाता : हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ का एजेंट होने के शक तथा जासूसी करने के आरोप में पाकिस्तानी नागरिक आबिद अली उर्फ  असद अली उर्फ अजीत सिंह की सजा बरकरार रखी है। सीजेएम कोर्ट हरिद्वार ने उसे 2012 में सात साल कठोर कारावास व साढ़े सात हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

2014 में हरिद्वार एडीजे कोर्ट से उसे रिहा कर दिया तो राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में विशेष अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने पाकिस्तानी नागरिक के बेल बांड निरस्त कर उसे हिरासत में लेने का आदेश दिया है। उसे अब जेल में पूर्व में बिताई गई अवधि से शेष सजा काटनी होगी। बुधवार को न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि आबिद अली के खिलाफ  पर्याप्त सबूत पाए गए हैं। उसने पासपोर्ट एक्ट का दुरुपयोग किया है। 

यह था मामला 

25 जनवरी 2010 को महाकुंभ के दौरान हरिद्वार के गंगनहर कोतवाली अंतर्गत एसओजी व एसटीएफ ने आबिद अली निवासी लाहौर पाकिस्तान को ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, विदेश एक्ट और पासपोर्ट एक्ट के तहत रुड़की से गिरफ्तार किया था। उसके पास मेरठ, देहरादून, रुड़की और अन्य सैन्य ठिकानों के नक्शे मिले थे। तलाशी में उसके पास एक पैनड्राइव, लेपटाप समेत अन्य गोपनीय जानकारी से जुड़े दस्तावेज भी बरामद हुए थे। पुलिस ने रुड़की के मच्छी मोहल्ला स्थित उसके ठिकाने पर छापा मारा तो वहां से बिजली फिटिंग के बोर्ड तथा सीलिंग फैन में छिपाकर रखे गए करीब एक दर्जन सिम कार्ड भी बरामद हो गए। 

सीजेएम कोर्ट से सजा एडीजे से बरी 

हरिद्वार सीजेएम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2012 को आबिद अली को दोषी पाते हुए सात साल कारावास व साढ़े सात हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस आदेश के खिलाफ अभियुक्त आबिद के अधिवक्ता ने एडीजे हरिद्वार की कोर्ट में अपील दायर की। वकील द्वारा मामले में आबिद के पते इत्यादि के बारे में सही तथ्य नहीं लिखा गया। 2014 में सुनवाई के दौरान अपर जिला जज द्वितीय हरिद्वार ने आबिद अली को बरी करने के आदेश पारित किया। इसके बाद जेल अधीक्षक के स्तर से कोर्ट तथा एसएसपी को प्रार्थना पत्र देकर बताया गया कि चूंकि आबिद अली विदेशी नागरिक है। इसलिए उसे रिहा करने से पहले उसका व्यक्तिगत बंधपत्र व अन्य औपचारिकताएं पूरी करनी आवश्यक हैं।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक अपर जिला जज ने जेल अधीक्षक के पत्र के संदर्भ में स्पष्ट किया कि इसके लिए अलग से आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं है। अभियोजन के अनुसार तत्कालीन एसएसपी ने भी मामले में गंभीरता नहीं दिखाई गई और उसे रिहा कर दिया। निचली अदालत के आदेश को सरकार ने हाई कोर्ट में विशेष अपील दायर कर चुनौती दी। सरकार द्वारा कहा गया कि निचली अदालत ने बिना ठोस सबूत पाते हुए पाकिस्तानी नागरिक को रिहा करने का आदेश दिया है, जिसे निरस्त किया जाए। उसके खिलाफ  जासूसी करने के कई सबूत हैं। 

रुड़की में किया था प्रेम विवाह 

अभियोजन के अनुसार आबिद 1985 में जाली दस्तावेजों से पासपोर्ट हासिल कर भारत आ गया था। उसने रुड़की के ही मच्छी मोहल्ला की लड़की से लव मैरिज की थी। ताकि इसकी आड़ में गोपनीय सूचनाएं एकत्र कर पाकिस्तान भेज सके। फिलहाल वह जमानत पर है। हाई कोर्ट ने आबिद की पैरवी के लिए न्याय मित्र भी नियुक्त किया था। 

हाई कोर्ट ने अपनाया था सख्त रवैया 

2014 में इस मामले में सरकार द्वारा विशेष अपील दायर की गई। 2017 में सुनवाई के दौरान ही तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह ने मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए तत्कालीन एसएसपी पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि एसएसपी ने बिना देश हित देखे पाकिस्तानी नागरिक को कैसे रिहा कर दिया। कोर्ट ने सरकार व पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए थे कि एसएसपी के खिलाफ विधिक कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने आरोपित के अधिवक्ता को भी फटकार लगाते हुए कहा था कि बिना हस्ताक्षर व गवाह के इस केस में कैसे पैरवी करने के लिए वकालतनामा दायर किया गया।

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