काशीपुर निवासी युवक की हिरासत में मौत मामले में पुलिस ने निभाया भाईचारा : हाईकोर्ट

काशीपुर कुंडेश्वरी निवासी प्रवेश कुमार की न्यायिक हिरासत में मौत मामले में हाईकोर्ट का बहुप्रतीक्षित आदेश जारी हो गया है। कोर्ट ने आदेश में कहा है कि एसएसपी द्वारा कानूनी दायित्व नहीं निभाया गया। उन्होंने संगीन अपराध में मुकदमा दर्ज करने के बजाय सीओ जांच के आदेश दिए।

Skand ShuklaMon, 26 Jul 2021 11:16 AM (IST)
काशीपुर निवासी युवक की हिरासत में मौत मामले में पुलिस ने निभाया 'भाईचारा' : हाईकोर्ट

नैनीताल, किशोर जोशी : काशीपुर कुंडेश्वरी निवासी प्रवेश कुमार की न्यायिक हिरासत में मौत मामले में हाईकोर्ट का बहुप्रतीक्षित आदेश जारी हो गया है। कोर्ट ने आदेश में कहा है कि एसएसपी द्वारा कानूनी दायित्व नहीं निभाया गया। उन्होंने संगीन अपराध में मुकदमा दर्ज करने के बजाय सीओ जांच के आदेश दिए। सरकार के कानूनी सलाहकारों के अनुसार अदालत ने तबादले पर विचार करने को कहा है, सरकार विचार करने को बाध्य नहीं है। सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है। जबकि बंदी रक्षकों के तबादले के निर्देश दिए हैं। बंदी रक्षकों का तबादला करने को लेकर होमवर्क शुरू हो गया है।

काशीपुर के विचाराधीन बंदी प्रवेश कुमार की हल्द्वानी जेल में मौत के मामले में जिला पुलिस बुरी तरह उलझ गई है। पहले सीजेएम नैनीताल ने जेल के चार बंदी रक्षकों के खिलाफ मामले में मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए, अब हाईकोर्ट ने सीबीआई को मामला ट्रांसफर करने का आदेश पारित कर पुलिस की फजीहत करा दी है। इस मामले में हाईकोर्ट के बहुप्रतीक्षित आदेश की प्रतिलिपि सरकार को मिल गई है। जागरण के पास भी आदेश की कॉपी उपलब्ध है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ के 16 पेज के आदेश में जिला पुलिस पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

संज्ञेय अपराध में प्राथमिकी दर्ज करना जरूरी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी के मामले में दिए फैसले का जिक्र करते हुए कहा है कि संज्ञेय अपराधों के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है। इस मामले में आरोप हिरासत में मौत के हैं। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से पत्र मिलने के बावजूद, एसएसपी नैनीताल ने प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उसने इस तरह की जांच करने के लिए कानून के तहत किसी अधिकार के बिना सर्किल अधिकारी पुलिस द्वारा जांच का आदेश दिया। जिला नैनीताल में पुलिस प्रमुख ने कानून के अनिवार्य प्रावधानों का पालन करने के बजाय कानून के उल्लंघन में कार्य किया और एफआईआर नहीं दर्ज कराई। जबकि याचिकाकर्ता प्रवेश की पत्नी भारती ने सभी तथ्यों को बताते हुए कि न्यायिक हिरासत में पति की मृत्यु कैसे हुई, कानून के अनुसार कार्रवाई की मांग की थी।

याचिकाकर्ता के मन में आशंका निराधार नहीं

न्यायालय यह निष्कर्ष निकालने के लिए इन टिप्पणियों को बनाता है कि याचिकाकर्ता के मन में आशंका निराधार नहीं है। याचिकाकर्ता के पास यह मानने का कारण है कि उसे पुलिस के पास निष्पक्ष जांच नहीं मिल सकती है। क्या यह "भाईचारे का संबंध" है कि मामला दर्ज नहीं किया गया था? क्या यह "भाईचारे का संबंध" है कि एएसपीस नैनीताल ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय सीओ हल्द्वानी से जांच का आदेश दिया? क्या सीओ हल्द्वानी ने पूछताछ के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि गवाह राहुल श्रीवास्तव के बयान की पुष्टि नहीं होती है? क्या यह "जी संबंध" है?

एसएसपी की जवाबदेही तय करने की जरूरत

सीओ हल्द्वानी ने अपना निष्कर्ष दर्ज करते हुए, उस डॉक्टर की भी जांच नहीं की, जिसने पोस्टमार्टम किया और चोट को नोट किया? जिस तरीके से पुलिस ने मामले में कार्यवाही की, उस पर विचार करने के बाद, यह न्यायालय पाता है कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें निश्चित रूप से जांच सीबीआई को हस्तांतरित की जानी चाहिए। न्यायालय यह भी देखना चाहेगा कि यह एक ऐसा मामला है जहां वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की जवाबदेही भी प्रशासनिक रूप से तय करने की आवश्यकता है।

जानिए क्‍या कहा सरकारी अधिवक्‍ता ने

नामजद आरोपित बंदी रक्षकों को तत्काल उप-जेल हल्द्वानी से जिले से बाहर स्थानांतरित किया जाए, ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके। एसएसपी नैनीताल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पर भी विचार किया जा सकता है, जिन्होंने तुरंत प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कानूनी दायित्व के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं की और बिना किसी अधिकार के कानून के तहत सीओ हल्द्वानी द्वारा एक मामले में जांच का निर्देश दिया। वहीं हाईकोर्ट में सरकारी अधिवक्ता जेएस विर्क के अनुसार आदेश की प्रतिलिपि मिली है। कानूनी पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। कोर्ट ने एसएसपी के तबादले पर विचार करने को कहा है, सुप्रीम कोर्ट का भी विकल्प है। जल्द निर्णय होगा।

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