सुंदरढूंगा में हताहत हुए पांच ट्रैकरों और पोर्टर नहीं चल सका पता, अभियान चलाने में आ रही ये दिक्‍कत

पिंडारी कफनी ग्लेशियर और सुंदरढूंगा घाटी के ट्रैकिंग रूट अलग-अलग होने के कारण प्रशासन के पास भी ट्रैकरों की जानकारी नहीं होती है। चमोली पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले से अधिकतर ट्रैकर हिमालय की तरफ जाते हैं। आपदा आने पर उन्हें रेस्क्यू करना मुश्किल काम हो जाता है।

Skand ShuklaSun, 24 Oct 2021 04:18 PM (IST)
सुंदरढूंगा में हताहत हुए पांच ट्रैकरों और पोर्टर नहीं चल सका पता, अभियान चलाने में आ रही ये दिक्‍कत

बागेश्वर, जागरण संवाददाता : पिंडारी, कफनी ग्लेशियर और सुंदरढूंगा घाटी के ट्रैकिंग रूट अलग-अलग होने के कारण प्रशासन के पास भी ट्रैकरों की जानकारी नहीं होती है। चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले से अधिकतर ट्रैकर हिमालय की तरफ जाते हैं। तीन जिलों के बीच समन्वय नहीं होने के कारण आपदा आने पर उन्हें रेस्क्यू करना मुश्किल काम हो जाता है। पिछले तीन दिनों से जिला प्रशासन की टीम सुंदरढूंगा में हताहत हुए पांच बंगाली ट्रैकरों और एक लापता जैकुनी गांव के गाइड को रेस्क्यू नहीं कर पा रही है। गाइडों के अनुसार कुछ ट्रैकरों सुंदरढूंगा से चमोली जिले की तरफ भी जाने की सूचना है। लेकिन उनकी सलामती के लिए केवल दुआएं की जा सकती हैं।

पर्वतारोही केशव भट्ट बताते हैं कि ट्रैकर पिथौरागढ़, बागेश्वर और चमोली जिले से भी पिंडर घाटी की तरफ प्रवेश करते हैं। जिनके लिए गोगिना, धूर और खाती में पंजीकरण केंद्र की स्थापना की जा सकती है। वाहनों की रूटीन चेकिंग भी तय होनी चाहिए। खरकिया और खाती में वन विभाग की चौकी खुलने पर उसका लाभ नहीं मिलेगा। एक रास्ता सौंग से भी जाता है। यह पैदल रास्ता है और धाकुड़ी होते हुए खरकिया पहुंचता है। इसके अलावा यहीं से दूसरा रास्ता सूपी गांव जाता है और ट्रैकर सीधे खाती पहुंचते हैं। चमोली जिले से आने वाले ट्रैकर धूर पहुंचते हैं।

स्थानीय गाइड जरूरी

देसी और विदेशी ट्रैकरों के साथ स्थानीय गाइडों की मदद जरूरी तय की जानी चाहिए। स्थानीय गांव के लोगों का पिंडर घाटी एक तरह से जंगल है। वह लगभग प्रतिदिन हिमालय की तरफ आते और जाते हैं। यदि पर्यटक भटक गए तो उन्हें यह लोग रास्ता आदि में मदद कर सकते हैं।

शोपीस बने हैं सेटेलाइट फोन

पर्वतारोही भुवन चौबे ने कहा कि प्रशासन ने आपदा के समय सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए बादियाकोट, बाछम, खाती आदि स्थानों पर सेटेलाइट की व्यवस्था की थी। लेकिन यह शोपीस बने हुए हैं। इसके अलावा धूर में लगा बीएसएनएल का टावर भी ठप है। यदि स्थानीय ग्रामीणों को वाकी टॉकी रखने की अनुमति मिलती है तो यह ट्रैकरों के लिए भी लाभदायक होगा। जिला अस्पताल के डा. राजीव उपाध्याय ने बताया कि हिमालय की तरफ जाने वाले अधिकतर देसी पर्यटक अंजान होते हैं। उन्हें साथ में दवाइयां, आक्सीजन आदि साथ में ले जाना आवश्यक है। हिमालय का मौसम पल में बदल जाता है। बर्फबारी और बारिश होती है। जिसके बाद ठंड लगती है। बिना दवाइयों के यहां जाना भी जान को खतरा रहता है।

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