आठ हजार सालों में 16 बार पड़ा चौतरफा समुद्र से घिरे रॉड्रिग्ज द्वीप में अकाल

प्रो गायत्री कठायत समेत ऑस्ट्रिया व अमेरिका के वैज्ञानिकों ने द्वीपों में जलवायु परिवर्तन पर 2012 में शोध किया था।

नीताल निवासी व चीन के जियान जिटोंग यूनिवर्सिटी में पर्यावरण इंजीनियर प्रो गायत्री कठायत समेत ऑस्ट्रिया व अमेरिका के वैज्ञानिकों ने द्वीपों में जलवायु परिवर्तन पर 2012 में शोध किया था। यह शोध 16 अक्टूबर को दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस एडवान्सेज में प्रकाशित हुआ है।

Skand ShuklaTue, 20 Oct 2020 11:16 AM (IST)

नैनीताल, किशोर जोशी : हिन्द महासागर के दक्षिणी द्वीप रॉड्रिग्ज में आठ हजार सालों के जलवायु चक्र में 16 बार अकाल पड़ा है। चौतरफा समुद्र से घिरे होने के बाद भी पानी की कमी की वजह से अनेक जीव-जंतुओं का अस्तित्व ही खत्म हो गया। नैनीताल निवासी व चीन के जियान जिटोंग यूनिवर्सिटी में पर्यावरण इंजीनियर प्रो गायत्री कठायत समेत ऑस्ट्रिया व अमेरिका के वैज्ञानिकों ने द्वीपों में जलवायु परिवर्तन पर 2012 में शोध किया था। यह शोध 16 अक्टूबर को दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस एडवान्सेज में प्रकाशित हुआ है।

 

शोध के अनुसार हिन्द महासागर के दक्षिण में रॉड्रिग्ज व मेडागास्कर द्वीप के बीच करीब 1600 किमी की दूरी के बाद भी गर्मियों की बारिश उष्णकटिबंधीय दक्षिण पूर्वी मानसून से प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों के दल ने आठ हजार साल के अध्ययन के शोध निष्कर्ष में बताया है रॉड्रिग्ज में 16 बार अकाल पड़ा। रॉड्रिग्ज करीब 50 किमी का द्वीप है और निकटतम द्वीप करीब 500 किमी हवाई दूरी पर है। अध्ययन में पाया कि मानसून की विफलता के दौरान समुद्री जल से घिरे होने के बावजूद भी रॉड्रिग्ज में पीने के शुद्ध पानी का संकट पैदा हो गया। माना गया कि रॉड्रिग्ज में मानव करीब चार सौ साल पहले आया जबकि मैडागास्कर में यह निश्चित नहीं है। अनुमान है कि करीब 1500 साल पहले से लेकर दस हजार पांच सौ साल पहले तक मानव आया हो।

 

जलवायु चक्र से विलुप्त हो गए मेगाफ्यूना

मैडागास्कर व रॉड्रिग्ज के दो हजार साल के मौसम चक्र व जीवाश्म के अध्ययन में पाया कि जो मेगाफ़्यूना ( दस किलो से अधिक वजन वाले जानवर) पिछले अधिक शुष्कता के एपिसोड से बच गए थे, वह जलवायु परिवर्तन व मानव गतिविधियों के कारण घटने के साथ विलुप्त हो गए। मेडागास्कर के मेगाफ़्यूना की पूरी आबादी विलुप्त हो गई। इन असहाय प्राणियों में गोरिल्ला के आकार के एक दर्जन से अधिक लैमुर प्रजातियां थी। आधा टन वजनी हाथी, तीन मीटर लंबे विशालकाय कछुए व डोडो पक्षी शामिल थे।

 

पानी के लिए है जंगली जानवरों का मानव बस्तियों पर हमला

प्रो गायत्री ने उत्तराखंड के वर्तमान संदर्भ में कहा कि पिछले कुछ सालों में मानव बस्तियों पर जंगली जानवरों का हमला तेजी से बढ़ा है। जो इस क्षेत्र में पीने के शुद्ध पानी की कमी की पहली बड़ी चेतावनी है। जंगली जानवरों को मानव अतिक्रमण से ना केवल खतरा बढ़ा है बल्कि उनकी खुद की जीवित रहने की क्षमता कम हुई है। पानी के लिए उन्हें आबादी का रुख करना पड़ रहा है। प्रो गायत्री के अनुसार सरकार ने सड़क विस्तार योजनाओं में वन्यजीव, जैव विविधता व प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव के दीर्घकालिक प्रभावों ध्यान नहीं रखा गया है। उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग 109 के विस्तार का उदाहरण देते हुए कहा कि विस्तार महत्वपूर्ण है मगर कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर पर्यावरण विनाश के साथ जंगल के बीचोंबीच से डायवर्ट किया है।

 

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