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गडेरी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रौखड़ में परंपरागत तौर-तरीकों के चलते कोरोना की नो एंट्री

बिना हाथों को साबुन या राख से साफ किए घर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

इम्यूनिटी बढ़ती रहे इसके लिए चाय पत्ती से तौबा कर अदरक तुलसी व नीम की पत्तियों की चाय पी रहे हैं। बाजारों से संक्रमण आने की संभावना न्यूनतम रहे इसके लिए सात-आठ परिवारों का सामान लाने के लिए एक व्यक्ति को बाजार भेज रहे हैं।

Prashant MishraWed, 05 May 2021 08:30 AM (IST)

किशोर जोशी, नैनीताल। जिला मुख्यालय से 26 किमी दूर वाहन से व पांच किमी दूर प्रकृति की गोद में बसा रौखड़ गांव में भले ही कोविड-19 संक्रमित का एक भी केस नहीं है, मगर ग्रामीण महामारी से बचाव के लिए परपंरागत तौर-तरीके अपनाकर गांव में कोरोना की एंट्री नहीं होने दी। वहीं, ग्रामीणों ने खानपान में पूरी तरह जैविक उत्पादों पर निर्भर हैं और कोविड गाइडलाइन का अनुपालन कर रहे हैं।

सुदूरवर्ती रौखड़ गांव पौष्टिïक गडेरी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। ग्राम सभा की आबादी ढाई सौ से अधिक है। आजीविका का मुख्य साधन खेतीबाड़ी, सब्जी उत्पादन है। सड़क से पांच किमी दूर होने के बाद भी ग्रामीण संक्रमण से बचाव को खूब जतन कर रहे हैं।  ग्रामीण आजकल पूरी तरह गांव के खेतों में ही उत्पादित सब्जी, अनाज, दालों का प्रयोग कर रहे हैं। बाजार की दालों के बजाय भट की चुड़कानी, उड़द, बड़ी, सब्जियों में आलू, गडेरी, पिनालु को महत्व दे रहे हैं। बुजुर्ग लोग धोती पहनकर सात्विक भोजन करते हैं।

इम्यूनिटी बढ़ती रहे, इसके लिए चाय पत्ती से तौबा कर अदरक, तुलसी व नीम की पत्तियों की चाय पी रहे हैं। बाजारों से संक्रमण आने की संभावना न्यूनतम रहे, इसके लिए सात-आठ परिवारों का सामान लाने के लिए एक व्यक्ति को बाजार भेज रहे हैं। ग्राम प्रधान योगेश्वर जीना के अनुसार बिना हाथों को साबुन या राख से साफ किए घर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। दूध, दही, घी के लिए हर घर में गाय, भैंस है। उपयोग से अधिक की बाजार में बिक्री की जाती है।

कोरोना को पराजित करने का राज

-गांव के चारों ओर खूबसूरत जंगल, शुद्ध जल, पर्याप्त ऑक्सीजन

-आहार में जैविक उत्पाद, दूध, दही व घी शामिल

-सुबह से शाम तक खेतों में काम

-भोजन से पहले साबुन या राख से हाथ की सफाई

ग्राम प्रधान योगेश्वर जीना ने बताया कि कोविड संक्रमण किसी तरह न हो, इसके लिए हर जतन किया जा रहा है। लोग पानी में गोमूत्र मिलाकर स्नान करते हैं। इससे शुद्ध रहने के साथ ही संक्रमण की संभावना खत्म हो जाती है। ग्रामीण जैविक उत्पादों का सेवन कर रहे हैं। शहर व सड़क से दूर होने के बाद भ गाइडलाइन का पालन किया जा रहा है।

गांव निवासी नंदा देवी ने बताया कि आजकल गांव में बैगन, मिर्च की पौध लगाई जा रही है। उड़द की दाल भी घरों में ही बनाई जा रही है। हमारे गांव में महामारी क कोई मामला नहीं है। फिर भी हम हर जतन कर रहे हैं।

वहीं, मदन सिंह का कहना है कि हम लोग आजकल खेतीबाड़ी में लगे हैं। यही हमारी आजीविका है, हम हर जतन कर रहे हैं, महामारी का हमें कोई खौफ नहीं है।

 

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