मकर संक्रांति पर्व पर विशेष : चम्पावत के ब्यानधुरा में पूजे और चढ़ाए जाते हैं धनुष-बाण, अज्ञातवास में अर्जुन ने यहीं छिपाया था गांडीव

ब्यानधुरा का शाब्दिक अर्थ 'बाण की चोटी' है।

इस चोटी का आकार धनुष बाण की तरह है। महाभारत काल के अलावा भी इस क्षेत्र में मुगल और हूणकाल में बाहरी आक्रमणकारियों का दौर रहा लेकिन यह आक्रमणकारी ब्यानधुरा की चमत्कारिक शक्ति के चलते इस चोटी से आगे पहाड़ की ओर नहीं बढ़ सके।

Publish Date:Thu, 14 Jan 2021 08:18 AM (IST) Author: Prashant Mishra

जागरण संवाददाता, चम्पावत : जिले में ब्यानधुरा एक ऐसा शक्तिस्थल है, जहां धनुष-बाण चढ़ाए और पूजे जाते हैं। हर वर्ष मकर संक्रांति पर्व पर सैकड़ों श्रद्धालुओं यहां पहुंचते है। महाभारत काल से ही ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे इस क्षेत्र को अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपना ठौर-ठिकाना बनाया था। अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष भी यहीं एक चोटी में छिपाया था।

 ब्यानधुरा का शाब्दिक अर्थ 'बाण की चोटी' है। चोटी का आकार भी धनुष बाण की तरह ही है। चम्पावत, नैनीताल व ऊधमसिंह नगर जनपदों की सीमा से लगा सेनापानी जंगल का यह क्षेत्र बियावान इलाका है। बाघ, हाथी सहित तमाम जंगली जानवरों की हमेशा यहां चहल-कदमी रहती है। महाभारत काल में पांडव कूर्मांचल के इस हिस्से में अज्ञातवास के दौरान रहे। कहते हैं कि पांडवों द्वारा छिपाया गया धनुष आज भी मौजूद है और ऐड़ी देव के अवतार ही उसे उठा पाते हैं। महाभारत काल के अलावा भी इस क्षेत्र में मुगल और हूणकाल में बाहरी आक्रमणकारियों का दौर रहा, लेकिन यह आक्रमणकारी ब्यानधुरा की चमत्कारिक शक्ति के चलते इस चोटी से आगे पहाड़ की ओर नहीं बढ़ सके।

बिरखम व मानव बस्तियों के अवशेष

ब्यानधुरा के सेनापानी क्षेत्र में आज भी मानव बस्तियां, बिरखमों व मूर्तियों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इतिहासकारों ने यहां की एतिहासिक महत्ता को अपनी पुस्तकों में उकेरा है। यह क्षेत्र हमेशा से इतिहासकारों के लिए शोध का विषय रहा है।

ऐड़ी देवता के रूप में होता है पूजन

ब्यानधूरा को एड़ी देवता के रूप में यहां पूजा जाता है। चमत्कारिक मान्यताओं के कारण जिले में कई स्थानों पर ऐड़ी देव के मंदिर स्थापित किए गए हैं। जहां देव डांगर अवतरित होकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। रक्षा और दुख निवारण के लिए अधिकांश लोग ऐड़ी देव की शरण में जाते हैं।

स्वप्न में मिला पूजन का आदेश

सूखीढांग क्षेत्र में रहने वाले इस मंदिर के पुजारी शंकर दत्त जोशी बताते हैं कि उनके पूर्वजों को स्वप्न में ब्यानधूरा चोटी पर धनुष-बाण पूजने का आदेश मिला। मकर संक्रांति पर्व से यहां अनादिकाल से पूजन और देव डंगरियों की धूनी लगने से अब यहां मेले का स्वरूप उभर आया है और लोग देव बाधाओं के निवारण के लिए जुटने लगे हैं।

रात्रि जागरण से मिलता है वरदान

इस स्थल पर जलते दीपक के साथ रात्रि जागरण करने से वरदान मिलता है। विशेषकर संतानहीन दंपतियों की मनोकामना पूर्ण होकर उनकी सूनी गोद भर जाती है। मनोकामना पूरी होने के बाद भक्त यहां धनुष-बाण चढ़ाने आते हैं।

अब लगने लगे भंडारे

पिछले एक दशक से मंदिर में बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए अब भंडारे के आयोजन होने लगे हैं। खटीमा, टनकपुर, चकरपुर और चम्पावत के विभिन्न संस्थाओं से जुड़े स्वयंसेवकों द्वारा भक्तों के लिए दो से तीन दिन तक निश्शुल्क भोजन आदि की व्यवस्था की जाती है।

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