गुम होती पहाड़ी भवन निर्माण शैली में जान फूंक रहीं बिहार की शगुन

Jagran Special पहाड़ की पारंपरिक भवन निर्माण शैली पहचान खो रही है। मूल रूप से बिहार निवासी शगुन सिंह पारंपरिक घर बनाने के लिए ग्रामीणों को प्रोत्साहित कर रही है। वह ईको फ्रेंडली व भूकंपरोधी घर बनाने का प्रशिक्षण भी दे रही हैं। विदेशी भी उनसे प्रशिक्षण लेते हैं।

Prashant MishraSat, 12 Jun 2021 12:37 PM (IST)
शगुन का बचपन से ही सपना था कि वह पहाड़ में अपने हाथों से अपना घर बनाए।

नैनीताल से नरेश कुमार। पहाड़ के लोग अपनी पुरातन परंपराओं व मान्यताओं को छोड़ आधुनिकता के रंग में रंगते जा रहे हैं। अब गांवों में भी मिट्टी, लकड़ी, पटाल (पत्थर की स्लेट) की जगह ईट व सीमेंट से निर्मित भवनों ने ले ली है। गांवों में गिने-चुने मिट्टी वाले घरों को भी लोग अब पक्के में तब्दील कर रहे है। इसी वजह से पहाड़ की पारंपरिक भवन निर्माण शैली पहचान खो रही है। इसी बीच मूल रूप से बिहार निवासी शगुन सिंह पारंपरिक घर बनाने के लिए ग्रामीणों को प्रोत्साहित कर रही है। वह अपनी संस्था के माध्यम से ऐसे ईको फ्रेंडली व भूकंपरोधी घर बनाने का प्रशिक्षण भी दे रही हैं। जहां विदेशी भी उनसे प्रशिक्षण लेते हैं।

मूल रूप से दोसम, पटना (बिहार) निवासी शगुन सिंह उच्च शिक्षा के लिए परिवार के साथ वर्षों पूर्व दिल्ली-एनसीआर आ गई। नोएडा में ही एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद शगुन ने दस वर्ष तक कई मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी की। शगुन का बचपन से ही सपना था कि वह पहाड़ में अपने हाथों से अपना घर बनाए। इसी सपने की खातिर उन्होंने नौकरी के दौरान ही देश-विदेश में जाकर विशेषज्ञों से आर्किटेक्चर और पर्माकल्चर (प्रकृति के अनुकूल निर्माण) का प्रशिक्षण लेकर महारत हासिल की।

नैनीताल में पांच साल पहले तैयार किया भूकंपरोधी घर

शगुन ने 2015 में नैनीताल के समीप महरोड़ा पंगूठ क्षेत्र में जमीन खरीद कर मिट्टी और लकड़ी से भूकंपरोधी घर तैयार किया। यह मॉडल हाउस उन्हें और स्थानीय लोगों को इतना पसंद आया कि उन्होंने इस तकनीक को प्रसारित करने की ठान ली। इसके बाद गीली मिट्टी नाम से संस्था का पंजीकरण कराकर लोगों को इस तकनीक का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।

वातानुकूल और ईको फ्रेंडली है घर

शगुन के अनुसार यह मकान अर्दन तकनीक पर आधारित है। इस तकनीक में लकड़ी का फ्रेम तैयार कर सीमेंट के कट्टों में मिट्टी भरकर दीवार निर्माण किया जाता है। जिसके बाद चिकनी मिट्टी से बाहर व भीतर दीवारों की लिपाई की जाती है। यह घर शीतकाल में गर्म और गर्मियों में ठंडे रहते है। ईको फ्रेंडली होने के साथ ही भूकंप रोधी होने के कारण पहाड़ों के लिए यह शैली सबसे बेहतर है।

विदेशी लोग भी ले चुकेे प्रशिक्षण

शगुन ने बताया कि वह दो से 45 दिवसीय कार्यशाला आयोजित करती है। इसके लिए प्रतिभागियों से प्रशिक्षण शुल्क भी लिया जाता है। हर कार्यशाला में गरीब और ग्रामीणों के लिए निश्शुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है। अब तक अमेरिका, फ्रांस, नेपाल, इटली, इंग्लैड, जर्मनी, जापान समेत 20 से अधिक देशों से पहुंचे 200 से ज्यादा लोग प्रशिक्षण ले चुके हैं।

अब कम्युनिटी टूरिज्म की ओर बढ़ा रही कदम

शगुन के मुताबिक अब महरोड़ा गांव में मिट्टी के मकान बनाने के साथ ही स्थानीय महिलाओं के लिए आजीविका कार्यक्रम चला रही है। अब ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी संस्था गीली मिट्टी कम्युनिटी टूरिज्म पर जोर दे रही है। कोविड के कारण यह शुरू नहीं हो पाया मगर जल्द इसे शुरू कर लिया जाएगा। शगुन देश के विभिन्न संस्थानों में वह बतौर कंसलटेंट प्रशिक्षण देने भी जाती है।

जीबी पंत राष्ट्री हिमालयी पर्यावरण शोध संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा. जगदीश चंद्र कुनियाल ने बताया कि पारंपरिक मकान बनाने की हमारी परंपरा व कला भूगर्भीय हलचल को बर्दास्त करने और तापमान को भी संतुलित रखने के लिहाज से बेहद उपयुक्त थी। मिट्टी, पत्थर व लकड़ी से बने घर ह़यूमन फ्रेंडली होने के साथ ही ईको टूरिज्म को भी बढ़ावा देने वाले हैं। वर्तमान में भूकंपरोधी ऐसे पारंपरिक घरों में आधुनिक विज्ञान व तकनीकी का समावेश भी किया जाए तो और बेहतर परिणाम आएंगे।

चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्‍ट (ईको टूरिज्‍म) डा. पराग मधुकर धकाते का कहना है कि पहाड़ की पारंपरिक भवन निर्माण शैली में कुछ बदलाव कर सुंदर प्रयोग किया गया है। भवनों में मिट्टी, लकड़ी और आसानी से उपलब्ध होने वाली सामग्री उपयोग में लाई गई है। अापदा के लिहाज से संवेदनशील उत्‍तराखंड के पर्वतीय इलाकों में पहले ईंट, सीमेंट और लोहे की बजाय घर इसी तरह से बनते थे। जो भूंकपरोधी और अधिक सुरक्षित भी थे।

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