डेढ़ साल बाद स्कूल पहुंचे 73 फीसद बच्चों की लिखने की आदत छूटी, जानिए और क्‍या आए बदलाव

कोरोनाकाल के डेढ़ वर्ष बाद स्कूल पहुंचे बच्चों में काफी कुछ बदल गया है। आनलाइन क्लास में केवल देखने व सुनने की वजह से 73 प्रतिशत छात्र-छात्राओं की लिखने की आदत छूट चुकी है। क्लास में लिखाने पर बच्चे थक जा रहे हैं या फिर उलझन महसूस कर रहे हैं।

Skand ShuklaThu, 14 Oct 2021 07:55 AM (IST)
डेढ़ साल बाद स्कूल पहुंचे 73 फीसद बच्चों की लिखने की आदत छूटी, जानिए और क्‍या आए बदलाव

गणेश पांडे, हल्द्वानी : कोरोनाकाल के डेढ़ वर्ष बाद स्कूल पहुंचे बच्चों में काफी कुछ बदल गया है। आनलाइन क्लास में केवल देखने व सुनने की वजह से 73 प्रतिशत छात्र-छात्राओं की लिखने की आदत छूट चुकी है। क्लास में लिखाने पर बच्चे थक जा रहे हैं या फिर उलझन महसूस कर रहे हैं। कई छात्र बहानेबाजी कर रहे हैं। घर लौटने के बाद बच्चे थकान महसूस होने की बात कह रहे हैं। कोरोनाकाल के बाद बच्चों में किस तरह के बदलाव आए हैं, इसे जानने के लिए हमने विभिन्न स्कूलों के अध्यापकों और प्रिंसिपल के माध्यम से शहर के 30 हजार बच्चों का सर्वे किया। पेश है खास रिपोर्ट।

आंकड़ों से समझें बदलाव

65 प्रतिशत बच्चे थकान महसूस कर रहे

55 फीसद बच्चे पहले से ज्यादा बहाने बना रहे

73 प्रतिशत बच्चों को लिखने में परेशानी हो रही

95 फीसद स्टूडेंट्स स्कूल आने के लिए उत्साहित

22 प्रतिशत बच्चों का वजन जरूरत से अधिक बढ़ा

जल्दी थक रहे बच्चे

कोरोनाकाल में बच्चे अधिकांश समय घरों में रहे। ऐसे में 65 प्रतिशत बच्चे जल्दी थक जा रहे हैं। अभिभावक शिक्षक संघ की बैठक में अभिभावकों ने शिकायत की कि बच्चे घर आकर थकान बता रहे हैं। खेलकूद, शारीरिक गतिविधि बंद होने से 22 फीसद बच्चे ओवरवेट भी हो गए हैं।

टिफिन खोलने तक की आदत छूटी

लंबे समय बाद स्कूल पहुंचे तीसरी क्लास तक के कई बच्चे अपना टिफिन खोलना तक भूल गए। बच्चे टीचर से टिफिन खोलने को कहते हैं। कक्षा में बार-बार पानी पीने, वाशरूम जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं। स्कूल नहीं आने के लिए यूनिफार्म छोटी होने का बहाना बना रहे हैं।

स्कूल आने को उत्साहित

अच्छी बात यह है कि बच्चे स्कूल आना चाहते हैं। सीबीएसई के 60 प्रतिशत स्कूलों को छोड़कर सभी सरकारी व मान्यता प्राप्त निजी स्कूल खुल चुके हैं। उपस्थिति 50 से 70 प्रतिशत पहुंच गई है।

टीचर की आदत भी बदली

आनलाइन पढ़ाई का असर शिक्षकों पर भी पड़ा है। क्लास में पढ़ाते समय बच्चों को साइलेंट कहने के बजाय शिक्षक म्यूट कह रहे हैं। छोटी कक्षाओं का प्रबंधन करने में भी समय लग रहा है।

बच्चे को नए सिरे से समझाएं

सुशीला तिवारी अस्पताल के मनोविज्ञानी डा. युवराज पंत ने बताया कि शिक्षक-अभिभावक दोनों को अधिक गंभीर होना होगा। बच्चे को चिड़चिड़ा न होने दें। धैर्य रखकर बच्चों को नए सिरे से समझाएं। अभिभावक घर पर अभ्यास कराएं। तीन-चार माह में स्थिति सामान्य हो जाएगी।

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