Haridwar Kumbh Mela 2021: सनातन धर्म परंपरा के वाहक हैं अखाड़े, आदि गुरु शंकराचार्य ने छठी शताब्दी में की थी इसकी स्थापना

कुंभ महापर्व का आकर्षण, वैभव, सनातनी शाही परंपरा का वाहक होते हैं, अखाड़े।

Haridwar Kumbh Mela 2021 सृष्टि में घटित होने वाली प्रत्येक विशेष घटना को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा सुना और जाना जाता है। कुंभ महापर्व का आकर्षण वैभव सनातनी शाही परंपरा का वाहक होते हैं अखाड़े। सबसे प्राचीन अटल अखाड़ा माना जाता है।

Mon, 22 Mar 2021 08:30 PM (IST)

अनूप कुमार, हरिद्वार। Haridwar Kumbh Mela 2021 सृष्टि में घटित होने वाली प्रत्येक विशेष घटना को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा, सुना और जाना जाता है। कुंभ महापर्व का आकर्षण, वैभव, सनातनी शाही परंपरा का वाहक होते हैं, अखाड़े। आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि के अनुसार अखाड़े को इसीलिए शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र की दीक्षा-शिक्षा भी दी गई, ताकि वैचारिक हमले का यह शास्त्र के अनुसार और शारीरिक हमले का यह शस्त्र से प्रतिउत्तर दे सकें, प्रतिकार कर सकें। इनमें सबसे प्राचीन अटल अखाड़ा माना जाता है, इसकी स्थापना का काल छठी शताब्दी, 569 ईसवी माना जाता है। 

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरि बताते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य ने चार दिशाओं में शंकराचार्य मठ की स्थापना के बाद अखाड़ों की स्थापना की थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय धर्म संस्कृति का प्रसार और उसकी रक्षा करना था। यही वजह थी कि अखाड़ों के संबंधित संत-महात्माओं, साधु-संन्यासियों को शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र की भी पूर्ण शिक्षा-दीक्षा दी जाती रही। अखाड़ों ने बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव को रोकने, सनातन हिंदू धर्म के उत्थान, प्रचार और रक्षा का काम किया। देश पर विदेशी आक्रांताओं के लगातार हमलों के दौरान इन्होंने कई मौकों पर राजाओं-महाराजाओं की मदद भी की। 

अखाड़ों को संन्यासी, बैरागी (वैष्णव) और उदासीन संप्रदाय के अनुसार इन 13 अखाड़ों को तीन भाग में बांटा गया। संन्यासी अखाड़ों को शैव भी कहा गया, यह शिव के उपासक होते हैं। आदिगुरु शंकराचार्य ने इन्हें दस पद नाम तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती, गिरि और पुरी भी दिए, इसलिए इन्हें दशनामी भी कहा गया। बैरागी को रामादल या रामानंदीय साधु भी कहते हैं और और यह मुख्यत: राम और हनुमान के उपासक होते हैं। दो उदासीन अखाड़े श्रीचंद्र भगवान के और निर्मल गुरुनानाक देव से लेकर गुरु गोविंद सिंह और गुरुग्रंथ साहिब के उपासक हैं। 

महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रविंद्रपुरी के अनुसार अखाड़ों में आचार्य महामंडलेश्वर और महामंडलेश्वर बनने की भी एक निर्धारित प्रक्रिया और परंपरा है, जिसे पूरा करने के बाद इसकी प्राप्ति की जा सकती है। अखाड़ों में साधु, संन्यासियों और संत-महात्माओं की बड़ी बिरादरी होती है। साथ ही पूरे देश में अखाड़ों की बड़ी संख्या में धार्मिक संपत्ति, मठ-मंदिर हैं। यह सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों पर होने के साथ-साथ अन्य जगहों पर भी स्थापित हैं। अखाड़ों में निहित संपत्ति का मालिक अखाड़ा होता है, जबकि इनकी देखरेख और वहां होने वाले धार्मिक आयोजनों की जिम्मेदारी अखाड़ों द्वारा नियुक्त साधु-संन्यासी करते हैं। अखाड़ों के अंदर पूरी तरह से लोकांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है और सभी को अलग-अलग जिम्मेदारी तय रहती है। व्यवस्था देखने को कोठारी महंत होता है, प्रशासनिक नियंत्रण को थानापति, भंडारी, कोठार, आदि अखाड़े की परंपरा का निर्वहन करते हैं, अखाड़े के अंदर कठोर अनुशासन का पालन होता है और गलती होने पर या लगातार अनुशासन भंग होने की दशा में अखाड़े के पंच-परमेश्वर उक्त को अखाड़े के बाहर का रास्ता दिखाने से भी नहीं चूकते। अखाड़ा परंपरा में इन पदों पर हर अर्द्धकुंभ और कुंभ आदि पर्व पर नए सिरे चयन होता और जिम्मेदारी नए संत-संन्यासी या महंत-श्रीमहंत को मिल जाती है।  

श्रीपंचायती निरंजनी अखाड़े के सचिव और मंसा देवी मंदिर के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज के अनुसार कुंभ आदि स्नान की यह सभी अखाड़े और उनमें शामिल संत-महात्मा, नागा संन्यासी कुंभ की वैभवशाली परंपरा के मुख्य आकर्षण होते हैं। इनकी शाही शान कुंभ के वैभव में चार चांद लगा देती है, जिसका साक्षी बनने को देश की नहीं विदेश से भी भारी संख्या में श्रृद्धालु और पर्यटक कुंभ का हिस्सा बनने को कुंभनगर पहुंचते हैं। 

संन्यासी, बैरागी, उदासीन और निर्मल के रूप में विभक्त हैं अखाड़े

सात संन्यासी अखाड़ों में महानिर्वाणी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, जूना अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा, आह्वान अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा और अटल अखाड़ा शामिल हैं।  तीन बैरागी (वैष्णव) अणियों जिनमें इनके 18 अखाड़े और 960 से अधिक खालसे शामिल हैं, में दिगंबर अणि, महानिर्वाणी अणि, निर्मोही अणि शमिल हैं। इसी तरह उदासीन संप्रदाय के दो अखाड़ों में उदासीन बड़ा अखाड़ा, उदासीन नया अखाड़ा तथा एक निर्मल अखाड़े के रूप में पंचायती निर्मल अखाड़ा शामिल हैं।

मणि, अणि, धूनी-धुआं में विभक्त है, संन्यासी, बैरागी और उदासीन

संन्यासी, बैरागी और उदासीन अखाड़ों की आतंरिक व्यवलस्था मणि, अणि, धूनी और धुआं में विभक्त है। संन्यासियों में मणि का प्रचलन है और ज्यादातर अखाड़ों में 52 के आधार पर आंतरिक व्यवस्था में इसी अनुसार साधु-संन्यासियों की जमात व्यवस्थित होती है। इसी तरह बैरागियों में अणियों के अनुसार और उदासीन में धूनी और धुआं के अनुसार। 

आचार्य महामंडलेश्वर, श्रीमहंत और अध्यक्ष होते हैं चेहरा

संन्यासी अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर कहलाते हैं और यही अपने-अपने अखाड़ों का चेहरा होते हैं। बैरागी अणियों में अणि प्रमुख अध्यक्ष होते है, जबकि उदासीन अखाड़ों में श्रीमहंत। इन्हें अपने अखाड़े या अन्य अखाड़े के साधुओं को महामंडलेश्वर बनाने का अधिकार होता है, यही उन्हें इसके निमित्त दीक्षा और शिक्षा देते हैं। 

यह भी पढ़ें-सनातनी संस्कृति के संवाहक हैं नागा संन्यासी, जानें- कैसे बनते हैं नागा; बेहद कठिन होती है प्रक्रिया

Uttarakhand Flood Disaster: चमोली हादसे से संबंधित सभी सामग्री पढ़ने के लिए क्लिक करें

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से जुड़ी प्रमुख जानकारियों और आंकड़ों के लिए क्लिक करें।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.