कठिन तपस्या कर शैलजा गिरि ने धारण कर लिया संन्यास, धर्म में जगी रुचि तो त्याग था दिया करियर

कठिन तपस्या कर शैलजा गिरि ने धारण कर लिया संन्यास।

Haridwar Kumbh Mela 2021 अवधूतानी की दीक्षा लेने वाली गुजरात की योगिनी श्रीमहंत माता शैलजा गिरि अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं। वह बास्केटबाल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी और कप्तान रह चुकी हैं। बैंडमिंटन में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व किया है।

Raksha PanthriFri, 09 Apr 2021 01:49 PM (IST)

जागरण संवाददाता, हरिद्वार। Haridwar Kumbh Mela 2021 अवधूतानी की दीक्षा लेने वाली गुजरात की योगिनी श्रीमहंत माता शैलजा गिरि अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं। वह बास्केटबाल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी और कप्तान रह चुकी हैं। बैंडमिंटन में भी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व किया है। माता शैलजा गिरि सहजयोग की प्रकांड विद्वान हैं और खेचरी तंत्र विद्या की परम ज्ञाता भी हैं और धारा प्रवाह हिंदी-अंग्रेजी में प्रवचन भी करती हैं। उन्होंने कठिन तपस्या कर संन्यास धारण कर लिया। 

कस्टम अधिकारी माता-पिता की संतान माता शैलजा गिरि का जन्म तंजानिया की राजधानी दार-अस-सलाम में हुआ था। वहीं उनका बचपन भी बीता, बाद में वह परिवार के साथ गुजरात चली आईं। आगे की शिक्षा उनकी यहीं पर हुई। बास्केटबॉल में रुचि होने पर इसी में अपना भविष्य बनाने की सोची, लेकिन बचपन से धर्म में रूचि होने और खेलों के दौरान यात्रा के समय विभिन्न धार्मिक स्थलों का भ्रमण करने के दौरान उनका मन इन सबसे हट गया।    

दैनिक जागरण से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि धर्म के प्रति उनकी आस्था बचपन से ही थी, उन्हें आम सांसारिक चीजें, बातें और कार्य-व्यवहार उतना आकर्षित नहीं करता था, जितना कि धर्म। उन्हें धर्म और धार्मिक चीजें, धर्म का वातावरण न सिर्फ आकर्षित करता था, बल्कि बचपन से ही उन्हें धर्म के गूढ़ रहस्य जानने की इच्छा रहती थी। घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों से अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए सवाल किया करती थीं। इसके बाद उन्हें सहजयोग के बारे में पता चला, धीरे-धीरे कर उन्होंने इसकी साधना करनी शुरू कर दी। धर्म-आध्यात्म की समझ होने लगी। इससे प्रभावित होकर धर्म-अध्यात्म की कठिन तपस्या कर उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और गुजरात के गिर क्षेत्र में अपना आश्रम भी स्थापित किया है। 

योगिनी श्रीमहंत माता शैलजा गिरि ने बताया कि खेचरी तंत्र विद्या एक कठिन विद्या है। इसके पूर्ण होने पर सिद्ध की जिह्वा (जीभ) के नीचे खेदन (छेदन) किया जाता है। इसकी भी लंबी प्रक्रिया होती है। बताया कि इस विद्या का सिद्ध महीनों बिना कुछ खाए-पीए साधना में लीन रह सकता है। बताया कि उन्होंने भगवान दत्तात्रेय को अपना गुरु माना है और उन्हीं को ध्यान में रखकर सभी साधना पूर्ण करती हैं। 

धर्म में जगी रुचि तो त्याग दिया करियर

संस्कृत में स्नातक श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा की अवधूतानी महामंडलेश्वर माता जयअंबे गिरि ने धर्म की सेवा का रास्ता चुना। वह अहमदाबाद के प्रतिष्ठित फैशन हाऊस और फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट में प्रबंध निदेशक के पद पर थीं। वह फैशन मॉडल व कुछ फिल्मी कलाकारों के भी कपड़े डिजाइन करने के साथ ही इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाले बच्चों को सिखाती भी थीं। अपने पेशे में वह अपने समय का स्थापित नाम थीं। 

प्रतिष्ठित सिंधी व्यवसायी परिवार की दूसरे नंबर की संतान महामंडलेश्वर अवधूतानी माता जयअंबे गिरि ने बताया कि अपने कामकाज के दौरान एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर महेंद्रानंद गिरि से हुई। उनका उन पर काफी प्रभाव पड़ा और अध्यात्म की तरफ उनकी रूचि अचानक से बढ़ गई  महेंद्रानंद गिरि के संपर्क में आने के बाद से उनका मन धर्म के अलावा अन्य चीज से उचट गया। धर्म-आध्यात्म की बातें उन्हें भाने लगीं और उसके गूढ़ रहस्य उन्हें लुभाने लगे।

इसी दौरान महामंडलेश्वर स्वामी महेंद्रनंद गिरि के सानिध्य में ही उनकी मुलाकात श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरिगिरि से हुई। उनसे इतना प्रभावित हुई कि घर, करियर सबकुछ छोड़ कर उनसे संन्यास दीक्षा लेकर अवधूतानी बन गईं। अखाड़े ने उन्हें महामंडलेश्वर पद से नवाजा। कहा कि धर्म और समाज की सेवा में उन्हें असीम आनंद की अनुभूति होती है। यह अनुभूमि उन्हें अपने फैशन डिजाइनिंग के काम में कभी नहीं हुई, जबकि वह उसमें अपनी इच्छा और शौक से थी।

दिल्ली के प्रसिद्ध फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट से बकायदा उसकी पढ़ाई की थी पर, दिल व दिमाग में संस्कृत की पढ़ाई के दौरान याद किए गए वेद मंत्र और श्लोक ही घूमते रहते थे। धर्म उन्हें हमेशा से अपनी ओर आकर्षित करता था, इसलिए जैसे पहला मौका मिला, सच्ची राह नजर आयी, वह सब कुछ छोड़ इस ओर दौड़ी चली आईं। 

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