जानें- नागा साधुओं से जुड़ी कई अहम बातें, गुलामवंश और औरंगजेब की सेना से भी किया था संघर्ष

जानें- नागा साधुओं से जुड़ी कई अहम बातें।

Haridwar Kumbh Mela 2021 वर्ष 1260 में श्रीपंचायती महानिर्वाण अखाड़ा के महंत भगवानंद गिरि के नेतृत्व में 22 हजार नागा साधुओं ने भीषण युद्ध के बाद हरिद्वार कनखल स्थित मंदिर को आक्रमणकारी गुलामवंश की सेना के कब्जे से मुक्त कराया था।

Raksha PanthriFri, 26 Mar 2021 04:08 PM (IST)

जागरण संवाददाता, हरिद्वार। Haridwar Kumbh Mela 2021 वर्ष 1260 में श्रीपंचायती महानिर्वाण अखाड़ा के महंत भगवानंद गिरि के नेतृत्व में 22 हजार नागा साधुओं ने भीषण युद्ध के बाद हरिद्वार कनखल स्थित मंदिर को आक्रमणकारी गुलामवंश की सेना के कब्जे से मुक्त कराया था। इसके बाद 1774 में काशी विश्वनाथ मंदिर की रक्षा को औरंगजेब के सेनापतियों के साथ भी जबरदस्त संघर्ष किया था और विजय प्राप्त की थी, जबकि 1771 में गढ़कुंठा पर औरंगजेब के कब्जा करने की कोशिशों का भी अखाड़े के नागा संन्यासियों ने पुरजोर विरोध किया था।

अखाड़े के संन्यासियों की इस वीरता के द्योतक दो भाले सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश विश्व प्रसिद्ध हैं। और हर विजयादशमी को इनकी पूरे विधि-विधान के साथ पुजा-अर्चना की जाती है। वर्तमान में महानिर्वाणी अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी महाराज हैं, जबकि सचिव रविंद्रपुरी जी महाराज हैं। अखाड़े की छावनी कनखल हरिद्वार में है, जहां से हरिद्वार कुंभ के निमित्त अखाड़े की समस्त व्यवस्थाओं का संचालन हो रहा है।

श्रीपंचायती महानिर्वाण अखाड़ा का इतिहास बेहद गौरवमयी है। साथ ही अखाड़े की स्थापना का प्रसंग भी बेहद रोचक है। बताया जाता है कि शंभु गिरि महाराज, शंकर गिरि महाराज, परशुराम गिरि महाराज, महादेव पुरी, रामगिरि, बलिराम गिरि, कपिल सेवक गिरि महाराज एक बार कठोर तपस्या के लिए एक साथ नेपाल यात्र पर गए। वहां उन्होंने पशुपतिनाथ भगवान की आराधना की। स्वप्न में उन्हें गंगा सागर जाकर अपनी तपस्या से कपिल मुनि महाराज को प्रसन्न करने का आदेश मिला। वहां उन्हें गंगा पार करने पर 15-16 वर्ष का बालक मिला, उसे उन्होंने अपने साथ ले लिया। सभी महंतों ने एक राय से बालक को देवदत्त गिरि नाम दिया।

गंगासागर में तपस्या के तीन वर्ष बाद उन्हें भगवान कपिल मुनि ने दर्शन दिए और अपना अखाड़ा स्थापित करने को आदेशित किया। कहा जाता है कि इसके ठीक दूसरे दिन आकाशवाणी हुई कि देवदत्त गिरि सबसे छोटा है, उसे छोटिया कहकर पुकारा जाए और वही अखाड़ा की स्थापना का काम करेगा। इस घटना का उल्लेख महंत लालपुरी लिखित दशनाम नागा संन्यासी पुस्तक में भी है। अखाड़े की स्थापना होते ही बिहार क्षेत्र से 45 महात्मा, काशी के मठों के 105 महात्माओं के साथ अटल अखाड़े के करीब दो हजार से अधिक महात्मा महानिर्वाणी अखाड़े के साथ हो लिए।

अखाड़े के ईष्ट देव हैं कपिल महामुनि

भगवान कपिल के आशीर्वाद से 671 ईस्वी में श्रीपंचायती महानिर्वाण अखाड़ा स्थापित हुआ था। इसकी स्थापना झारखंड के हजारीबाग जिले के गढ़कुंठा बैजनाथ धाम (सिद्धेश्वर महादेव मंदिर) में रूप गिरि सिद्ध, उत्तम गिरि सिद्ध, रामस्वरूप सिद्ध, शंकरपुरी मौनी, भवानीपुरी, उध्र्वाबाहु, देववन मौनी, ओंकार भारती तथा पूर्णानंद भारती के हाथों होना बताया जाता है। जबकि कुछ इतिहासकार और संतों का मत है कि हरिद्वार में नीलधारा के पास इसकी स्थापना हुई थी। कुछ मानते हैं कि हरिद्वार में इसकी स्थापना विक्रम संवत 805 ईस्वी में कनखल के झंडा चौक के पास हुई थी। यह आज भी यह वहीं स्थित है।

प्रयागराज के दारा गंज में है मुख्यालय

महानिर्वाणी अखाड़े का मुख्यालय दारा गंज प्रयागराज में है। इसकी अन्य शाखाएं कुरुक्षेत्र, नासिक, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, ओंकारेश्वर और में हैं। हरिद्वार कनखल स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर इसी अखाड़े के अधीन है। यह अखाड़ा कर्मकांड विद्यालय, वेद विद्यालय चलाकर अपने क्रियाकलापों से भारतीय संस्कृति की गौरवमयी परंपरा की रक्षा कर रहा है।

मार्ग में मिले महात्मा

नेपाल यात्र के दौरान मार्ग में उन्हें एक अपरिचित महात्मा मिले। उन्होंने महंतों के उद्देश्य, त्याग, तप और ज्ञान से प्रभावित होकर उन्हें अपना आशीर्वाद देते हुए रास्ते में प्राणरक्षा को दो लकड़ियां प्रदान की। यही दोनों लकड़ियां बाद में भाले में परिवर्तित हो गई। सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश नाम के यह दोनों भाले आज भी अखाड़े की शोभा बढ़ा रहे हैं।

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