संत की कलम से : सनातन संस्कृति-लोक आस्था का विश्व पर्व, महाकुंभ - बाबा हठयोगी

बाबा बलरामदास हठयोगी, राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिल भारतीय संत समिति। फाइल फोटो

महाकुंभ सनातन संस्कृति और लोक आस्था का विश्व पर्व है इसमें देश-दुनिया के सभी जाति-धर्म संप्रदाय के मानने वाले सम्मिलित होते हैं। कई इसमें आस्था के निमित्त आते हैं तो तमाम कौतूहलवश की कैसे करोड़ों-करोड़ों लोग लोक आस्था के फलीभूत इतने बड़े आयोजन के साझीदार बनते हैं ।

Sunil NegiFri, 29 Jan 2021 11:05 AM (IST)

महाकुंभ सनातन संस्कृति और लोक आस्था का विश्व पर्व है, इसमें देश-दुनिया के सभी जाति-धर्म, संप्रदाय के मानने वाले सम्मिलित होते हैं। कई इसमें अपनी आस्था के निमित्त आते हैं तो तमाम कौतूहलवश की कैसे करोड़ों-करोड़ों लोग लोक आस्था के फलीभूत इतने बड़े आयोजन के साझीदार बनते हैं और दान-पुण्य कमाते हैं। कुंभ सनातन धार्मिक संस्कृति का वृहद रूप है जो विश्व को विराट भारतीय धर्म सांस्कृति का संदेश देता है। यही वजह है कि कुंभ की अलौकिक छटा और विशेषताओं हर किसी को अचंभितक्रती है, अनायस ही अपनी ओर खींच ले आती है। इसका वर्णन तो देवताओं की वाणी ने भी किया है, यह देवीय आयोजन है। देवी-देवताओं की कृपा से इसका सौभाग्य धरती लोक को भी प्राप्त है।

यह धार्मिक आस्था और विश्र्वास की पराकाष्ठा भी है। सनातन धर्म और संस्कृति का शिखर पर्व कुंभ, धरती लोक पर ऐसा अद्भुत आयोजन है, जिसका इंतजार देवी-देवताओं भी करते हैं। इसमें समस्त देवी-देवताओं का वास होता है, यह अटल और अविनाशी है। क्षीर सागर में शेषनाग की रस्सी से  किए गए समुद्र मंथन से निकले अमृत को हुए  देवताओं और असुरों में हुए संग्राम के दौरान धरती लोक पर जहां-जहां भी अमृत की बूंदें गिरी। वहां पर देवताओं के आदेश से कुंभ का आयोजन आरंभ हुआ। इस कारण ही कुंभ धरती लोक के साथ साथ  देव लोक में भी आस्था का महापर्व है। यह विशेष ज्योतिष गणना और नक्षत्रीय संयोग में ही होता है। कुंभ पर सभी देवी देवताओं की उपस्थिति अनिवार्य रूप से रहती है।

नक्षत्रीय संयोग और समस्त देवी-देवताओं की उपस्थिति गंगाजल को अमृत समान कर देती है। इस लिहाज से हरिद्वार कुंभ का अपना अलग स्थान और महत्व है, क्योंकि गंगा जी ने सर्वप्रथम यहीं पर धरती के मैदानी क्षेत्र को स्पर्श किया था, यहीं ब्रह्मदेव ने देवी-देवताओं संग उनकी आरती की थी। हरिद्वार में अबकी कुंभ के लिए विशेष योग 12 वर्षों की बजाय 11 वर्ष में पड़ रहा है। नक्षत्रों का यह विशेष संयोग गंगा के पावन व औषधिय गुण युक्त जल को अमृतमयी बना देता है। मान्यता और परंपरा है कि अलौकिक पावन स्थितियों में गंगाजल के पूजन और स्नान मात्र से ही  व्यक्ति स्वर्ग लोक की प्राप्ति का भी हकदार बन जाता है। उसके सभी तरह के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं, उसे, उन से मुक्ति मिल जाती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है।

[बाबा हठयोगी, राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिल भारतीय संत समिति]

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