राजनीति की भेंट न चढ़ जाए गरीबों के आशियाने

-माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में पीएम आवास योजना का मामला -जियो टैग सर्वे के बाद य

JagranFri, 03 Dec 2021 01:18 AM (IST)
राजनीति की भेंट न चढ़ जाए गरीबों के आशियाने

-माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में पीएम आवास योजना का मामला

-जियो टैग सर्वे के बाद योजना का लाभ देने से किया जा रहा है इन्कार

संवाद सहयोगी, डोईवाला: माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में गरीबों के आशियाने के मामले में ग्राम प्रधान अनिल पाल और उपप्रधान आमने-सामने आ गए हैं। ग्राम प्रधान वन विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र के बाद ही ग्रामीणों को पीएम आवास योजना का लाभ देने की बात कह रहे हैं। वहीं उप्र प्रधान जियो टैग सर्वे वाली जमीन पर आवास निर्माण की अनुमति देने की बात कह रहे हैं।

ग्राम सभा के उपप्रधान रामचंद्र का कहना है कि ग्राम पंचायत में इंदिरा आवास के अलावा कलस्टर के माध्यम से रूर्बन मिशन योजना के साथ ही ग्राम पंचायत के अलावा मनरेगा,लोक निर्माण विभाग ,विधायक निधि के साथ ही करोड़ों रुपये के कार्य इसी गांव में हुए हैं। जब उन कार्य में किसी प्रकार की रोक या प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं पड़ी तो आशियाने बनाने में क्यों प्रमाण पत्रों के फेर में ग्रामीणों को उलझाया जा रहा है और उन्हें आवास योजना के लाभ से वंचित रखने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं बड़कोट रेंजर धीरज रावत ने भी वन विभाग की ओर से किसी प्रकार की आपत्ति से इन्कार किया है। जिसके बाद सवाल यह उठ रहा है की जब वन विभाग ने कोई आपत्ति की ही नहीं है तो ग्रामीणों को वन विभाग के आपत्ति के फेर में क्यों उलझाया जा रहा है।

वहीं लाभार्थी देवराम का कहना है कि क्षेत्र के जंगल को हमारे पूर्वजों ने प्लांटेशन कर उगाया है। जिस पर वन विभाग की ओर से गांव के 223 परिवार को चार - चार बीघा भूमि दी गई थी। जिस पर हमारे परिवार निवास कर रहे हैं। इसी आधार पर हमारे जाति व मूल निवास आदि भी बनाए जाते हैं। जिस की सूची वन विभाग में भी उपलब्ध है। उसके बावजूद भी आवास का लाभ ना देना गलत है।

लाभार्थी ब्यान्तो देवी व कर्मा देवी का कहना है कि जब अन्य योजनाओं के कार्य गांव में हो सकते हैं तो प्रधानमंत्री आवास योजना के आवास इस गांव में क्यों नहीं बन सकते।

लाभार्थी ताराचंद का कहना है कि अनुदान स्वीकृत होने के बावजूद भी खाते सीज किए गए हैं। जिससे कि खातों में ग्रामीणों के जो स्वयं के पैसे हैं उसका भी उपयोग ग्रामीण नहीं कर पा रहे हैं। इससे ग्रामीणों के सामने संकट खड़ा हो गया है।

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