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बासमती धान की खेती के प्रति रूझान बढ़ाने को विज्ञानी आए आगे

बासमती धान की खेती के प्रति रूझान बढ़ाने को विज्ञानी आए आगे

राजेश पंवार विकासनगर बासमती धान की उपज के मामले में देहरादून का नाम था लेकिन अब नाममात्र की खेती हो रही है।

JagranSat, 15 May 2021 08:02 PM (IST)

राजेश पंवार, विकासनगर:

बासमती धान की उपज के मामले में देहरादून का नाम था, लेकिन अब नाममात्र की खेती ने विज्ञानियों और कृषि अधिकारियों को भी चितित कर दिया है। बासमती धान की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ाने को कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के विज्ञानी आगे आए हैं। दरअसल रोग और कीट लगने की वजह से बासमती धान की खेती किसान लगभग छोड़ चुके हैं। इसको देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों और उप परियोजना अधिकारी आत्मा परियोजना ने एपीडा के बासमती निर्यात संस्थान मेरठ से नवीनतम उन्नत प्रजातियों के बासमती व संकर धान के बीच किसानों को उपलब्ध कराए हैं। इन प्रजातियों में रोग व कीट का प्रकोप न के बराबर है, जिससे किसान मनमाफिक उत्पादन ले सकते हैं।

देहरादून के तराई व मैदानी क्षेत्रों में 70-80 फीसद क्षेत्रफल में संकर धान, पांच फीसद में बासमती व 20-25 फीसद क्षेत्रफल में सुगंधित धान कस्तूरी, शरबती, पूसा सुगंधा की फसल लहलहाती है। वर्तमान में नवीनतम उन्नत बासमती की तीन प्रजातियां पूसा बासमती-1637, पूसा बासमती-1718 व पूसा बासमती-1728 व संकर धान की अराइज-6444 प्रजातियां हैं। कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के तहत खेती की नई तकनीक को कृषक प्रक्षेत्र तक पहुंचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के विज्ञानियों प्रभारी अधिकारी डॉ. एके शर्मा और डॉ. संजय सिंह, नीरज कुमार पटेल उप परियोजना अधिकारी आत्मा परियोजना ने प्रयास तेज किए हैं। विज्ञानियों ने पूर्व में किए गए बासमती धान के प्रसार को आधार मानकर बासमती की नवीनतम उन्नत प्रजातियां को एपीडा के बासमती निर्यात संस्थान मेरठ से बीज मंगाया। क्षेत्र के जमनीपुर, पृथ्वीपुर, एटनबाग, प्रतीकपुर, धर्मावाला, डोईवाला के किसानों को नवीनतम उन्नत प्रजातियों का गुणवत्ता युक्त बीज प्रदर्शन के लिए उपलब्ध भी कराए गए। किसानों को कोविड-19 के कारण सुरक्षात्मक तरीके से खेती के कार्य करने के प्रति जागरूक भी किया। ग्राम जमनीपुर में 20 कृषकों को नीरज कुमार पटेल उप परियोजना अधिकारी आत्मा परियोजना आदि ने बीज का वितरण किया। कार्यक्रम में नरेंद्र कुमार, अशोक पठानिया, रामेश्वर सिंह, बृजपाल सिंह, राजेंद्र सिंह, कृष्णपाल, सुरेश कुमार, शीला देवी, सरफराज खान, एजाज खान, अनिल कुमार आदि किसान मौजूद रहे।

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पूसा बासमती 130 दिन में पककर होती है तैयार

विकासनगर: विज्ञानी डॉ. संजय सिंह ने जानकारी दी कि पूसा बासमती 1637 किस्म 130 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसके दाने की लंबाई लगभग 7.3 मिलीमीटर व पकने के बाद 13.8 मिलीमीटर लंबी हो जाती है। प्रति एकड़ 16 से 18 क्विंटल उपज प्राप्त हो जाती है। इस प्रजाति में जीवाणु जनित झुलसा और झोंका रोग की समस्या भी नहीं दिखाई देती। पूसा बासमती 1718 प्रजाति 135 दिन में पकने वाली है, इसकी पैदावार क्षमता 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ है। दाने की गुणवत्ता अच्छी होने के साथ-साथ चावल की लंबाई भी अच्छी है। पूसा बासमती 1728 किस्म 140 से 145 दिन के मध्य पककर तैयार हो जाती है। पैदावार देने की क्षमता प्रति एकड़ 20 से 24 कुंटल रहती है, जो किसान पूसा बासमती 1609 को लगाना चाहते हैं, यह प्रजाति लगभग 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर लगभग 46 क्विंटल पैदावार देने की क्षमता रखती है। विज्ञानी डॉ. संजय सिंह ने किसानों को समझाया कि वह इन प्रजातियों को पकने की अवधि के आधार पर इनकी गुणवत्ता युक्त पौध तैयार करने के लिए समय रहते हुए खेत की तैयारी और पौध की बुवाई का कार्य कर सकते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि बासमती धान में अधिक नत्रजन एवं कीटनाशक रसायनों और फफूंदनाशक की मात्रा का प्रयोग केवल कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही करना चाहिए। अनावश्यक रूप से रसायनों का प्रयोग करने पर इनकी गुणवत्ता कम हो जाती है।

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पुरानी प्रजातियों में उत्पादन कम होने से घटा रूझान

विकासनगर: बासमती धान की पुरानी प्रजातियां टाइप-3 बासमती 370 तरावड़ी व अन्य देसी बासमती की उपज कई प्रकार के कीट और रोग लगने के कारण उपज काफी कम प्राप्त होती है। जिसके चलते किसान बासमती धान की खेती लगभग छोड़ चुके हैं, लेकिन बासमती धान की खेती में कीट व रोग का प्रबंधन उचित प्रकार से यदि कर लिया जाए तो इसके धान की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है। बाजार में मूल्य भी अच्छा मिलता है। विज्ञानियों ने जानकारी दी कि पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से पिछले कई वर्षों में बहुत सी उपयोगी बासमती धान की प्रजाति जैसे पूसा बासमती 1121, पूसा बासमत, उन्नत पूसा बासमती 1637, पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1728, पूसा बासमती 1509 व 1609 को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड के तराई व मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया है, जिनमें पैदावार भरपूर होने के साथ-साथ बीमारियां भी कम लगती हैं।

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