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सौ करोड़ के लिए नहीं, मुद्दों पर फिल्म बनाना पसंद है विवेक अग्निहोत्री को

देहरादून, हिमांशु जोशी। फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि वह पैसों के लिए नहीं, दिल की आवाज सुनकर फिल्में बनाते हैं। कमर्शियल फिल्मों के बजाय उन्हें मुद्दों पर फिल्में बनाना पसंद है। वह सौ करोड़ के लिए फिल्में नहीं बनाते।   

अपने नए प्रोजेक्ट 'कश्मीर फाइल' की शूटिंग के सिलसिले में देहरादून पहुंचे निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने जागरण से अपनी भविष्य की योजनाओं पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पहले मैं कमर्शियल फिल्में बनाया करता था, लेकिन बाद में मुझे लगा कि नहीं, देश की सच्चाई लोगों के सामने आनी चाहिए। इसके बाद मैने मुद्दों पर आधारित फिल्में बनानी शुरू की। इसे लोगों ने काफी पसंद भी किया। 

फिल्म 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' से मैने इसकी शुरुआत की। इसके बाद मैने अपनी दूसरी फिल्म 'द ताशकंद फाइल' बनाई। इस फिल्म को भी काफी सफलता मिली। इस फिल्म का ही असर था कि इस साल पहली बार दो अक्टूबर को इंटरनेट पर पूरे दिन शास्त्री जी का नाम ट्रैंड कर रहा था। विवेक कहते हैं कि आज का दर्शक बदल रहा है, उसे कमर्शियल फिल्मों के साथ ही मुद्दों पर बेस्ड फिल्में पसंद आ रही हैं।

सौ करोड़ के लिए नहीं बनाता हूं फिल्में 

विवेक कहते हैं कि मुझे मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने में डर नहीं लगता है। दरअसल, मैं सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने के लिए फिल्में नहीं बनाता हूं। मैं तो बस इतना चाहता हूं कि फिल्म अपनी लागत निकाल ले और जो सच्चाई में लोगों के सामने लाना चाहता हूं, वो लोगों तक पहुंच जाए। लोगों में क्रांति आनी चाहिए, जागरूकता आनी चाहिए। यदि मेरी फिल्म यह करने में सफल होती है तो समझों में सफल हूं। 

कश्मीरी हिंदुओं पर अत्याचार पर आधारित है कश्मीर फाइल 

निर्देशक विवेक अग्निहोत्री जल्द ही फिल्म 'कश्मीर फाइल' के जरिये दर्शकों के सामने होंगे। फिल्म कश्मीर फाइल कश्मीर के हालात और कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर आधारित हैं। विवेक कहते हैं कि इस फिल्म की शूटिंग वे जनवरी या मार्च में उत्तराखंड में करेंगे। फिलहाल अभी फिल्म की रिसर्च के लिए वे अमेरिका जा रहे हैं।

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क्या है आइ एम बुद्धा

विवेक और उनकी पत्नी अभिनेत्री पल्लवी जोशी 'आइ एम बुद्धा' नाम से एक एनजीओ चला रहे हैं। विवेक का कहना है कि इस एनजीओ का उद्देश्य छोटे शहर की ऐसी प्रतिभाओं को दुनिया के सामने लाना है, जिनका बड़े शहरों में कोई गॉड फादर नहीं है। उनमें प्रतिभा है, लेकिन उन्हें मंच नहीं मिलता है। हालात यह है कि उन्हें हिंदी फिल्में केवल इसलिए नहीं दी जाती हैं, क्योंकि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है। हमारा एनजीओ ऐसी प्रतिभाओं को स्कॉलरशिप देकर मंच उपलब्ध कराता है। 

अब तक की उपलब्धि

चॉकलेट, दन-दना-दन गोल, हेट स्टोरी, बुद्धा इन ए ट्रैफिक, जुनूनियत, द ताशकंद फाइल। 

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