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बारह हफ्ते में मिट्टी बनने वाला प्लास्टिक ईजाद, सीपैट ने भी दी मान्यता

बारह हफ्ते में मिट्टी बनने वाला प्लास्टिक ईजाद, सीपैट ने भी दी मान्यता
Publish Date:Wed, 22 Jan 2020 08:28 AM (IST) Author: Sunil Negi

देहरादून, सुमन सेमवाल। पॉलीथिन की थैलियां अब पर्यावरण के लिए सिरदर्द नहीं होंगी। प्लास्टिक की ऐसी थैली तैयार कर ली गई है, जो कूड़े में फेंके जाने पर 12 सप्ताह के भीतर स्वत: ही मिट्टी बन जाएगी। इस थैली को रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक्स टेक्नोलॉजी (सीपैट) ने भी मान्यता दे दी है। इसके बाद ऐसी थैलियों के उत्पादन व प्रयोग पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने भी मुहर लगा दी है।

तीन माह से भी कम अंतराल में स्वत: ही मिट्टी बनने (कंपोस्टेबल एंड बायोडिग्रेडेबल) वाली थैली को देहरादून की ही सिद्धी पैकेजिंग कंपनी ने ईजाद किया है। उत्पाद को तैयार करने के बाद उन्होंने इसे टेस्टिंग के लिए सीपैट (चेन्नई) को भेजा था। वहां आठ महीने तक थैली को विभिन्न परीक्षण से गुजारा गया। परीक्षण के दौरान जब ये थैलियां मिट्टी में तब्दील हो गईं तो इस मिट्टी पर टमाटर व धान उगाए गए। इस मिट्टी में उत्पादन की स्थिति 91 से 92 फीसद रही। जब सीपैट की रिपोर्ट को सीपीसीबी में जमा कराया गया तो यहां से भी उत्पाद को आसानी से हरी झंडी दे दी गई। हालांकि, केंद्रीय बोर्ड ने निर्देश दिए हैं कि इस तरह की थैलियों के उत्पादन में हर थैली पर सीपैट की रिपोर्ट का नंबर, कंपनी का लाइसेंस नंबर व 100 फीसद कंपोस्टेबल/बायोडिग्रेडेबल लिखना जरूरी होगा। ताकि किसी भी तरह की जांच के समय डुप्लीकेसी को पकड़ा जा सके।

इसलिए मिट्टी बन जाती है थैली

यह थैली ब्रेकेबल पॉलीमर चेन का हिस्सा है, जबकि सामान्य पॉलीथिन व पॉली-प्रॉपलीन अनब्रेकेबल पॉलीमर चेन का हिस्सा होती हैं। जो स्वत: नष्ट नहीं हो पाती है। स्वत: मिट्टी बनने वाली थैलियां स्टार्च से बनाई जा रही हैं और यह पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित भी है।

जिसे कपड़ा समझकर बिकवाया जा रहा, वह 100 फीसद प्लास्टिक

उत्तराखंड समेत तमाम राज्यों में पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसकी जगह सरकारों ने कपड़े जैसे दिखने वाली थैलियों को हरी झंडी दे दी है। हालांकि, हकीकत में यह प्लास्टिक ही है। यानी कि एक प्लास्टिक को हटाकर दूसरे प्लास्टिक की बिक्री कराई जा रही है। यह चौंकाने वाला खुलासा भी सीपैट की जांच में किया गया। देहरादून के ही डोईवाला नगर में सीपैट के स्थानीय केंद्र ने बाजार में प्रचलित ऐसी थैलियों की जांच की। 13 जनवरी 2019 को जारी की गई जांच रिपोर्ट में पाया गया है कि बाजार में प्रचलित ऐसी थैलियां पॉली-प्रॉपलीन है। जो कि 100 फीसद प्लास्टिक की श्रेणी में आती है। इस तरह के खुलासे से राज्य सरकार के अधिकारी भी सकते में हैं। इस पर शहरी विकास विभाग के अपर सचिव अशोक कुमार पांडे ने सीपैट व सीपीसीबी के प्रमाणीकरण के बाद सभी नगर निकायों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं कि वह कंपोस्टेबल व बायोडिग्रेडेबल कैरी बैग को ही प्रयोग में लाएं। शेष तरह के कैरी बैग पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने को कहा गया है। इसके साथ ही अशोक कुमार पांडेय का कहना है कि अप्रमाणित कैरी बैग की बिक्री व स्टॉक करने पर विधिक कार्रवाई भी अमल में लाई जाए।

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प्लास्टिक से निकलती है हानिकारक मीथेन गैस

यदि सामान्य प्लास्टिक की थैलियों को कूड़े में फेंक दिया जाए तो इससे ओजोन लेयर को क्षति पहुंचाने वाली मीथेन गैस निकलती है। वहीं, स्वत: नष्ट होने वाली थैली से सामान्य कूड़े की तरह कम हानिकारक और कम मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है। 

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