उत्तराखंड में पंजीकृत आयुष चिकित्सक और पैरामेडिकल को खुलेगी रोजगार की राह

उत्तराखंड में पंजीकृत आयुष चिकित्सक और पैरामेडिकल को खुलेगी रोजगार की राह।

भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड में पंजीकृत आयुष चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ को रोजगार की राह खुलेेगी। परिषद ने उपनल को इस बावत एक प्रस्ताव भेजा है। जिसमें कोविड संकट के मद्देनजर मानव संसाधन की कमी दूर करने के लिए आयुष चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ को नियुक्ति की बात कही।

Sunil NegiFri, 14 May 2021 12:05 PM (IST)

जागरण संवाददाता, देहरादून। भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड में पंजीकृत आयुष चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ के लिए रोजगार की राह खुल सकती है। परिषद ने उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड (उपनल) को इस बावत एक प्रस्ताव भेजा है। जिसमें कोविड संकट के मद्देनजर मानव संसाधन की कमी दूर करने के लिए आयुष चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ को उपनल में पंजीकृत कर नियुक्ति की बात कही गई है।

परिषद के अध्यक्ष डॉ. दर्शन कुमार का कहना है कि कोरोना महामारी के कारण चिकित्सा क्षेत्र में मानवशक्ति की बहुत अधिक आवश्यकता है। परिषद में आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ (आयुर्वेदिक फार्मेसिस्ट, नर्स, पंचकर्म सहायक, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा सहायक व पंचकर्म अटेंडेंट) का पंजीकरण किया जाता है। फिलवक्त करीब पांच हजार चिकित्सक व 3500 पैरामेडिकल स्टाफ पंजीकृत है। कोरोनाकाल में राजकीय आयुष चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ ने भी बड़ी जिम्मेदारी निभाई है। ऐसे में इस संकटकाल में उनकी भी भूमिका बढ़ी है। अब जबकि प्रशिक्षित स्टाफ की आवश्यकता है, परिषद में पंजीकृत चिकित्सक व पैरामेडिकल स्टाफ को उपनल के माध्यम से कोविड केयर सेंटर, जांच केंद्र, सर्वेक्षण कार्य, टीकाकरण आदि कार्य में नियुक्त किया जा सकता है।

एलोपैथिक दवाओं के इस्तेमाल का मिले अधिकार

भारतीय चिकित्सा परिषद, उत्तराखंड ने आयुष चिकित्सकों को भी एलोपैथिक दवाओं के इस्तेमाल का अधिकार देने की मांग की है। इस संबंध में एक पत्र मुख्यमंत्री को भेजा है। अध्यक्ष डॉ. दर्शन कुमार का कहना है कि कोरोनाकाल में आयुष चिकित्सक पूरी शिद्दत के साथ दिन-रात काम कर रहे हैं। उत्तराखंड जैसे विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले राज्य में वह सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पर एलोपैथिक दवाओं के इस्तेमाल का अधिकार न होने के कारण वे एक सीमा तक ही उपचार कर पाते हैं। यदि यह अधिकार दिया उन्हें दिया जाता है तो वह निश्चित ही राज्य के लिए लाइफ लाइन सिद्ध होंगे। उत्तर प्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में यह अधिकार उन्हें दिया भी गया है। कोरोना महामारी को देखते हुए राज्य सरकार को जल्द यह फैसला लेना चाहिए।

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