आओ पौधे लगाएं : बढ़ाओ कदम जरा, धरा को बनाएं हरा; पढ़ि‍ए पूरी खबर

पर्यावरण संरक्षण और धरा को हरा बनाने की चर्चाएं अक्सर होती हैं। लेकिन बेहद कम लोग धरातल पर कार्य करने को आगे आते हैं। यदि हर कोई पौधे लगाना और उन्हें विकसित करना अपनी जिम्मेदारी समझ ले तो न हमें किसी अभियान की आवश्यकता होगी।

Sunil NegiFri, 18 Jun 2021 04:50 PM (IST)
आओ पौधे लगाएं : बढ़ाओ कदम जरा, धरा को बनाएं हरा।

जागरण संवाददाता, देहरादून। पर्यावरण संरक्षण और धरा को हरा बनाने की चर्चाएं अक्सर होती हैं। लेकिन, बेहद कम लोग धरातल पर कार्य करने को आगे आते हैं। यदि हर कोई पौधे लगाना और उन्हें विकसित करना अपनी जिम्मेदारी समझ ले तो न हमें किसी अभियान की आवश्यकता होगी और न ही पर्यावरण संरक्षण को चिंता जताने की जरूरत पड़ेगी। हालांकि, दून में कई ऐसे लोग भी हैं, जो समय-समय पर पौधे रोपकर धरा को हरा बनाने के प्रयास में जुटे हैं। साथ ही पे्ररणा दे रहे हैं कि आम नागरिक के तौर पर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाई जाए।

पौधे लगाएं मानवता जताएं

अमोघ नारायण मीणा (छात्र, केहरी गांव) का कहना है कि मैं पिछले पांच वर्ष से हर साल विभिन्न अवसरों पर पौधारोपण कर रहा हूं। जिस तरह से शहर विकसित हो रहे हैं, यहां हरियाली बरकरार रखने की चुनौती है। इसलिए मैं कोशिश करता हूं कि पौधे लगाकर आसपास के क्षेत्रों को हरा-भरा बनाऊं और अन्य को भी प्रेरणा प्रदान करूं।बसंत शर्मा (सामाजिक कार्यकर्त्‍ता) का कहना है कि समाज सेवा केवल इंसान की मदद करना नहीं, बल्कि प्रकृति का ख्याल रखना भी एक प्रकार का सेवा कार्य है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा अस्तित्व ही प्रकृति से है। ऐेसे में पेड़-पौधों की घटती संख्या हमारे अस्तित्व पर सवाल है। मैं कई वर्षों से पौधारोपण कर रहा हूं और लोग को भी प्रेरित करता हूं। अंकित शाह, सचिव (सर्व कल्याण विकास समिति) का कहना है कि गांव के साथ ही शहरों में भी पौधे लगाने का प्रयास कर रहा हूं। वैसे भी शहरों में पौधारोपण की अधिक आवश्यकता है। शहरवासियों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए पौधे जरूर रोपने चाहिए। हमारी समिति भी इस दिशा में कार्य कर रही हैं। हालांकि, मैं व्यक्तिगत तौर पर कई साल से पौधे रोप रहा हूं। एसके अग्रवाल (मुख्य वाणिज्य निरीक्षक, रेलवे) का कहना है कि यह बेहद आसान कार्य है, लेकिन कोई जहमत नहीं उठाना चाहता। पौधे रोपने के लिए न तो ज्यादा समय की आवश्यकता है और न ही मेहनत की। मुझे जब भी अवसर मिलता है मैं पौधे रोपता हूं और उनका ध्यान भी रखता हूं। स्टेशन परिसर में ही कई पौधे पिछले चंद वर्षों में विकसित किए जा चुके हैं।

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