यहां गौरेया को बचाने के लिए शिक्षा विभाग का अनूठा अभियान, स्कूल बनेगा इस पक्षी का घर

गौरेया पक्षी को बचाने के लिए शिक्षा विभाग ने अनूठे अभियान की शुरुआत की है। कभी हर घर-आंगन में फुदकने चहकने वाली गौरेया अब नजर नहीं आती है। पर्यावरणविद इसे लेकर कई बार चिंता भी जता चुके हैं।

Raksha PanthriThu, 25 Nov 2021 01:55 PM (IST)
यहां गौरेया को बचाने के लिए शिक्षा विभाग का अनूठा अभियान, स्कूल बनेगा इस पक्षी का घर।

रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। शिक्षा विभाग ने ईको क्लब के माध्यम से गौरेया पक्षी को बचाने के लिए अनूठे अभियान की शुरुआत की है। कभी हर घर-आंगन में फुदकने, चहकने वाली गौरेया अब नजर नहीं आती है। पर्यावरणविद इसे लेकर चिंता जता चुके हैं। गौरेया को बचाने और आसपास उसे रहने को जगह देने-दिलाने का अभियान भी तेज हुआ है। गढ़वाल मंडल के माध्यमिक शिक्षा अपर निदेशक महावीर सिंह बिष्ट ने भी ईको क्लब के माध्यम से यह जिम्मेदारी उठाई। सभी सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों व प्रधानाध्यापकों को पत्र लिखकर उन्होंने ईको क्लब के माध्यम से विद्यालय भवनों में लकड़ी से बने घोंसलों को लगाने के निर्देश दिए हैं, ताकि विलुप्त होती गौरेया की प्रजाति को संरक्षित किया जा सके। पत्र में उन्होंने यह हिदायत भी दी कि वह खुद इसकी समीक्षा भी करेंगे। उनकी यह मुहिम इंटरनेट मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। शिक्षक समुदाय इसे सराह रहा है।

पदोन्नति में छूट से बल्ले-बल्ले

शिक्षा विभाग से तेज हुई मुहिम अंजाम तक पहुंची तो लाभ राज्य के सभी कार्मिकों को मिला। सरकारी इंटर कालेजों में प्रधानाचार्यों के एक हजार से ज्यादा पद रिक्त हैं। पदोन्नति के इन पदों को भरना विभाग के लिए सिरदर्द से कम नहीं है। कालेज में पढ़ाई का माहौल बनाने का बड़ा दारोमदार प्रधानाचार्य पर है। प्रधानाध्यापक पदों की संख्या कम है। ऐसे में प्रधानाचार्य पदों पर पदोन्नति के लिए प्रधानाध्यापक पदों पर पांच साल के सेवा अनुभव की अनिवार्यता में छूट देने की पैरवी लंबे समय से की जा रही थी। बीते महीने शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में यह मामला मुख्य सचिव डा एसएस संधु के सामने उठा था। उन्होंने इस समस्या के समाधान को पदोन्नति में शिथिलता की नियमावली पर लगी रोक हटाने का भरोसा दिया था। आखिरकार इस महीने सरकार ने रोक हटा ली। शिक्षा विभाग की हनक के तौर पर इसे देखा जा रहा है।

छात्र हित में भूल सुधार

व्यापक छात्रहित में सरकार ने भूल सुधार ली। एमबीबीएस की पढ़ाई सस्ती करने के लिए मंत्रिमंडल की बीते माह हुई बैठक में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। सरकारी मेडिकल कालेजों में बांड भरने वालों के लिए सालाना शुल्क 50 हजार रुपये तय किया गया। एमबीबीएस का सालाना शुल्क चार लाख रुपये से घटाकर 1.45 लाख रुपये किया गया। नए दाखिला लेने वाले छात्र-छात्राओं को यह लाभ देने का निर्णय हुआ। बांड नहीं भरने वाले छात्र वर्तमान में एमबीबीएस पाठ्यक्रम के दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ष में भी अध्ययनरत हैं। मंत्रिमंडल की पिछली बैठक में इन छात्र-छात्राओं की सुध नहीं ली गई थी, लेकिन इसके बाद अगली बैठक में यह खामी दुरस्त कर दी गई। मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया कि बांड नहीं भरने वाले सभी छात्रों को घटाए गए शुल्क का लाभ मिलेगा। सरकार के इस फैसले से सरकारी कालेजों के सैकड़ों प्रशिक्षु डाक्टरों ने राहत की सांस ली है।

छात्र संघ चुनाव ने उलझाया

उच्च शिक्षा मंत्री डा धन सिंह रावत को इन दिनों छात्र संघ चुनाव के मुद्दे से जूझना पड़ रहा है। मामला नाजुक है और चुनावी साल है। कोरोना महामारी की वजह से बीते सत्र में छात्र संघ चुनाव नहीं कराए गए थे। चालू शैक्षिक सत्र में कोरोना संक्रमण के हालात दुरुस्त होने में कई महीने गुजर गए। अब विश्वविद्यालयों को परीक्षा, परीक्षाफल की चुनौती से निपटना पड़ रहा है। लिहाजा छात्र संघ चुनाव का ख्याल तक नहीं आया। राजनीतिक दलों और छात्र नेताओं ने इस मुद्दे को गरमा दिया है। छात्र संघ चुनाव न हों, सरकार ऐसा संदेश नहीं देना चाहती। विभागीय मंत्रीजी को छात्र राजनीति का पुराना अनुभव है। मामला उछलते ही उन्होंने तुरंत चुनाव को लेकर गेंद विश्वविद्यालयों के पाले में सरका दी। विश्वविद्यालय शासन का मुंह ताक रहे हैं। छात्र नेता भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे। फिलवक्त वेट एंड वाच की रणनीति है।

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