72 घंटे चीनी सैनिकों पर भारी पड़े राइफलमैन जसवंत सिंह, जानिए वीरता की कहानी

देहरादून, दीपिका नेगी। क्या आपने राइफलमैन जसवंत सिंह रावत का नाम सुना है? यदि नहीं, तो यह फिल्म अवश्य देखें। सीना चौड़ा हो जाएगा। जान जाएंगे कि 1962 में चीन नहीं हालात हम पर भारी पड़े थे। भौगोलिक परिस्थितियां हम पर भारी पड़ी थीं, जो चीन के पक्ष में थीं। वरना हमारे जांबाज योद्धाओं का सामना कर पाना चीनियों के बूते की बात न थी। यह शौर्यगाथा इस बात का पुख्ता प्रमाण देती है। अकेले जसवंत सिंह रावत जैसा हमारा वीर योद्धा इस युद्ध में 300 चीनी सैनिकों पर भारी पड़ा था। वह भी पूरे 72 घंटे तक।

21 साल का यह नौजवान कैसे भूखा-प्यासा रहकर अरुणाचल प्रदेश के बॉर्डर पर लगातार 72 घंटे तक दुश्मनों से लड़ता है और आखिर में वीरगति को प्राप्त हो जाता है। शौर्य, देशप्रेम और बलिदान से भरी यह हैरतअंगेज कहानी पहली बार सिनेमा के पर्दे पर देखने को मिलेगी। दुनिया को जसवंत सिंह रावत के बेमिसाल शौर्य से रू-ब-रू कराने के लिए '72 ऑवर्स : मार्टियर हू नेवर डाइड' फिल्म बनाई गई है, जो देशभर  के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही है। 

फिल्म के मुख्य किरदार में देहरादून के अविनाश ध्यानी हैं। उन्होंने फिल्म का निर्देशन करने के साथ ही इसकी पटकथा भी लिखी है। फिल्म के निर्माता भी देहरादून के ही जेएसआर प्रोडक्शन के जसवंत, प्राशिल और अरुण रावत हैं। अजय भारती ने इसमें बतौर कोरियोग्राफर काम किया है। फिल्म में अस्सी प्रतिशत कलाकार उत्तराखंड से हैं। 

फिल्म की शूटिंग उत्तराखंड के चकराता, वैराट खाई व हर्षिल के अलावा रेवाड़ी (हरियाणा) में हुई। फिल्म के गीत सुखविंदर, शान, मोहित चौहान व श्रेया घोषाल ने गाए हैं। फिल्म में चौथी गढ़वाल राइफल के राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की नूरांग में लड़ी वीरता की कहानी को दर्शाया गया है। उनके साथी लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी, गोपाल सिंह, स्थानीय लड़कियों नूरा और सेला की बहादुरी को भी यह कहानी बयां करती है। 

अविनाश ने बताया कि तीन साल की रिसर्च के बाद फिल्म की पटकथा लिखी गई। इस दौरान वह महावीर चक्र विजेता शहीद जसंवत सिंह रावत के पौड़ी जिले में स्थित बाडिय़ूं गांव भी गए, जहां उनके रिश्तेदारों से बातचीत कर उनके जीवन से जुड़े कई पहलुओं को जाना। इसके अलवा उन्होंने उनके युद्ध के दौरान के साथी कीर्ति चक्रविजेता गोपाल सिंह गुसाईं से भी मुलाकात की, जिनसे उन्हें काफी जानकारी मिली। 

बकौल अविनाश, कहानी लिखने के दौरान मैंने शहीद की आत्मा को अपने आसपास महसूस किया। मेरे पिता भी सेना में थे। बचपन में अक्सर पिता से मैं राइफलमैन जसवंत की वीरता के किस्से सुना करता था। तभी से इस रियल हीरो ने मेरे मन में जगह बना ली थी। फिल्म बनाने के पीछे मेरा ध्येय इस असल कहानी से सबको रू-ब-रू कराना है। 

अब भी जिंदा है जांबाज...

इस अमर शहीद के सम्मान में अरुणाचल प्रदेश के तवांग में बाबा जसवंत सिंह नाम से मंदिर बना हुआ है। उनके नाम पर एक स्थानीय क्षेत्र का नाम जसवंतगढ़ पड़ गया। स्थानीय लोग आज भी मानते हैं कि बाबा जसवंत सिंह बॉर्डर पर उनकी रक्षा करते हैं। 

ऐसा माना जाता है कि आत्मा के विचरण करने में यकीन न रखने वाले भी उनकी मौजूदगी को चुनौती देने का दम नहीं रखते। हर दिन उनकी वर्दी प्रेस की जाती है और बूट पॉलिश कर रखे जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि ड्यूटी के दौरान अगर सेना का कोई जवान सोता है तो उसे बाबा थप्पड़ मारकर जगा देते हैं। यहां तक कि शहीद होने के इतने साल बाद भी सम्मान स्वरूप बाबा जसवंत को प्रमोशन और छुट्टियां भी दी जाती हैं। 

चीनी सैनिक भी झुकाते हैं सिर... 

हर राहगीर इस शहीद के स्मारक (शहादत स्थल) पर नमन कर ही आगे बढ़ता है। उनका स्मारक गुवाहाटी से तवांग जाने के रास्ते में 12 हजार फीट की ऊंचाई पर बना है। यहां चीनी सैनिक भी सिर झुकाते हैं। लड़ाई के दौरान चीनी सैनिक उनका सिर काटकर ले गए थे। उनकी वीरता के आगे यह कायरता हार गई। चीनी सेना ने जसवंत की वीरता का सम्मान करते हुए न केवल उनका सिर लौटाया, बल्कि कांस्य प्रतिमा भेंट की। 

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