गुलामी की बेड़ियां तोड़ने वाला गुरुकुल, क्रांतिकारियों के केंद्र के रूप में इंग्लैंड तक प्रसिद्ध

सामाजिक समरसता सौहार्द एकता समान शिक्षा व शोषणविहीन समाज की संरचना कर स्वस्थ एवं उद्दात जीवन का दर्शन प्रतिपादित किया स्वामी श्रद्धानंद ने। पढ़िए गुरुकुल कांगड़ी विवि की स्थापना करने वाले स्वामी श्रद्धानंद तथा उनकी शैक्षिक पहल पर प्रो. रूप किशोर शास्त्री का आलेख...

Raksha PanthriSun, 26 Sep 2021 08:36 AM (IST)
गुलामी की बेड़ियां तोड़ने वाला गुरुकुल। फाइल फोटो

प्रो. रूप किशोर शास्त्री। Gurukul Kangri University सामाजिक समरसता, सौहार्द, एकता, समान शिक्षा व शोषणविहीन समाज की संरचना कर स्वस्थ एवं उद्दात जीवन का दर्शन प्रतिपादित किया स्वामी श्रद्धानंद ने। क्रांतिकारियों के केंद्र के रूप में इंग्लैंड तक प्रसिद्ध गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले राष्ट्रीय सोच के धनी स्वामी श्रद्धानंद तथा उनकी शैक्षिक पहल पर प्रो. रूप किशोर शास्त्री का आलेख...

दुर्व्यसनों में आकंठ डूबे एक नौजवान मुंशीराम को जब बरेली में आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का सान्निध्य मिला तो उसके जीवन की दशा एवं दिशा ही बदल गई। नाम बदलकर स्वामी श्रद्धानंद हो गया। अब देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराना ही उनका एकमात्र ध्येय बन गया। इसी कड़ी में लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के विरोध में उन्होंने प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। इसकी परिणति वर्ष 1902 में गंगा के किनारे कांगड़ी (हरिद्वार) में गुरुकुल नामक शिक्षण संस्था की स्थापना के रूप में हुई। आज यह संस्था गुरुकुल कांगड़ी अथवा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के नाम से जानी जाती है और उन्हीं संस्कारों, शिक्षा व राष्ट्र भक्ति के प्रदीप्त भावों के साथ कार्य कर रही है।

सिंहगर्जना से डरे अंग्रेज

गुलामी की बेड़ियां तोड़ने में स्वामी श्रद्धानंद स्वातंत्र्य समर के तेजस्वी योद्धा बनकर चमके। 30 मार्च, 1919 को सत्याग्रही आंदोलनकारियों ने रौलेट एक्ट के खिलाफ चांदनी चौक, दिल्ली में विशाल रैली निकाली, जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे। अंग्रेजी फौज ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो स्वामी श्रद्धानंद संगीनों के सामने सीना तानकर ऊंचे स्वर में बोले, ‘चलाओ गोलियां, श्रद्धानंद का सीना खुला है।’ उनकी इस सिंहगर्जना के सामने अंग्रेजी सैनिक टुकड़ी पीछे हट गई। आज भी चांदनी चौक में घंटाघर के पास उसी स्थान पर स्वामी श्रद्धानंद की विशाल प्रतिमा उनकी वीरता, धीरता व निर्भयता की गाथा बयान कर रही है।

निर्भीक संन्यासी बना आंदोलनकारी

देश में आजादी के लिए संघर्ष करने एवं सर्वस्व बलिदान करने वाले स्वातंत्र्य वीरों के राष्ट्रीय मंच के रूप में कांग्रेस वृहदाकार ले चुकी थी। लाल-बाल-पाल ने प्रखरता के साथ आंदोलन की धार को तेज कर दिया था। गांधीजी के आह्वान पर रौलेट एक्ट के विरोध में छोटे-बड़े सत्याग्रह, सभाएं, अधिवेशन होने लगे। इसी शृंखला में वैशाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा रखी गई थी। तब पंजाब के गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर के आदेश पर जनरल डायर ने दुनिया के सबसे बड़े एवं दुर्दांत गोलीकांड को अंजाम दिया। इस क्रूर कृत्य ने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। इसी वर्ष कांग्रेस का अखिल भारतीय अधिवेशन अमृतसर (पंजाब) में प्रस्तावित था।

तय हुआ कि इस दौरान देश के तीव्र विक्षोभ और जनाक्रोश रूपी नगाड़ों से ब्रिटिश सरकार के कान फाड़ने थे। यह जिम्मेदारी निर्भीक संन्यासी स्वामी श्रद्धानंद को सौंपी गई। अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष बने श्रद्धानंद और सभापति की जिम्मेदारी संभाली पं. मोतीलाल नेहरू ने। संयोग से दोनों ही युवाकाल के सहपाठी थे, लेकिन सभी कांग्रेसी समय की कमी और तैयारियों के अभाव में अधिवेशन की सफलता को लेकर आशंकित थे। तब श्रद्धानंद दृढ़ता से बोले, ‘निश्चिंत रहें, अधिवेशन अभूतपूर्व, पूर्ण व्यवस्थित व सफलतम होगा।’

बहरहाल, पूरी तरह व्यवस्थित ढंग से 26 दिसंबर, 1919 को यह ऐतिहासिक अधिवेशन शुरू हुआ। इसमें दक्षिण और पूर्वोत्तर जैसे सुदूरवर्ती प्रांतों से बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता व प्रतिनिधि शामिल हुए। इस दौरान स्वामी श्रद्धानंद ने बतौर स्वागताध्यक्ष पहली बार हिंदी में भाषण दिया। अधिवेशन में लोकमान्य तिलक, पं. मोतीलाल नेहरू, एनी बेसेंट, पं. मदनमोहन मालवीय, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, स्वरूप रानी नेहरू, कमला नेहरू, विजयलक्ष्मी नेहरू, कृष्णा नेहरू, देशबंधु चितरंजनदास, विपिनचंद्र पाल, कस्तूरी रंगा आयंगर आदि ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

शालीन व्यवहार बना हथियार

इसी कालखंड में गुरुकुल कांगड़ी परिसर में एक बड़ा घटनाक्रम हुआ, जिसका उल्लेख ‘छीना बच्चा हथिनी से’ नामक पुस्तक में हुआ है। पुस्तक के लेखक एवं गुरुकुल के स्नातक उदयवीर विराज लिखते हैं, -महाराष्ट्र निवासी वेदमूर्ति पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर एक बार घूमते-घूमते हरिद्वार पहुंच गए। इस दौरान वे गुरुकुल कांगड़ी भी आए। यह स्थान उन्हेंं इस कदर भाया कि फिर यहीं रुकने का मन बना लिया। सातवलेकर ने मुंबई के ललित कला विद्यालय से चित्रकला की विधिवत शिक्षा ली थी। इसलिए गुरुकुल के प्रबंधकों से अनुरोध किया कि वह गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को चित्रकला सिखाएंगे। गुरुकुल के प्रबंधकों को इसमें कोई आपत्ति न थी।

कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि ‘वेद का राष्ट्रगीत’ शीर्षक से उनका जो लेख कोल्हापुर की पत्रिका में छपा था, उसे राजद्रोहात्मक मानकर कोल्हापुर रियासत की सरकार ने उनके, पत्रिका के संपादक व प्रकाशक के विरुद्ध मुकदमा चलाया है। तीनों को सजा भी सुनाई गई है और पत्रिका के संपादक व प्रकाशक को जेल में डाल दिया गया है। अब पुलिस उन्हें तलाश रही है।

कोल्हापुर रियासत की पुलिस ने उत्तर प्रदेश पुलिस से अनुरोध किया कि गुरुकुल कांगड़ी में रह रहे इस राजद्रोही को उसे सौंप दीजिए। सातवलेकर की गिरफ्तारी को पुलिस लाव-लश्कर के साथ गुरुकुल रवाना हो गई। सातवलेकर अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार के कारण सभी के प्रिय थे, सो बड़ी कक्षाओं के कुछ विद्यार्थी बोले, ‘हम आपको गिरफ्तार नहीं होने देंगे। हमें मारने के बाद ही पुलिस आपको हाथ लगा पाएगी।’

इस पर सातवलेकर ने उन्हें समझाया, ‘तुम लोगों ने तनिक भी उपद्रव किया तो पुलिस को गुरुकुल को बंद करने का बहुत बढ़िया बहाना मिल जाएगा। फिर, मैं कोई जन्मभर के लिए जेल थोड़े जा रहा हूं। अधिक से अधिक छह महीने की जेल होगी। फिर यहां आकर तुम लोगों से मिलूंगा।’ अध्यापकों ने भी ब्रह्मचारियों को समझाया, जिससे मामला शांतिपूर्वक निपट गया। सातवलेकर ने आत्मसमर्पण कर दिया। पुलिस उन्हें अपमानित करने के लिए बेड़ियां पहनाकर ले जाने लगी तो उन्होंने जयघोष किया, ‘वंदेमातरम’। प्रत्युत्तर में ब्रह्मचारियों ने भी सम्मिलित स्वर में उद्घोष किया, ‘वंदेमातरम’।

तमाम कुरीतियों का किया खंडन

असल में स्वामी श्रद्धानंद और गुरुकुल कांगड़ी की शिक्षा प्रणाली ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। इंग्लैंड तक चर्चा थी कि गुरुकुल कांगड़ी क्रांतिकारियों का केंद्र है। इसे देखने एवं वस्तुस्थिति मालूम करने वर्ष 1916 में वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड, संयुक्त प्रांत के राज्यपाल सर जेम्स मेस्टन और इंग्लैंड के भावी प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडानल्ड लाव-लश्कर के साथ गुरुकुल आए। गुरुकुल परिवार ने उनका भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के अनुसार स्वागत किया। किसी ने भी उन्हें एहसास नहीं होने दिया कि गुरुकुल क्रांतिकारियों का केंद्र है। यह था स्वामी श्रद्धानंद की उन्नत व उदात्त राष्ट्रीय सोच और उसी भाव से सींचा गया वट-वृक्ष बना आजादी की पराकाष्ठा का गुरुकुल। स्वामी श्रद्धानंद का जीवन दर्शन उनकी उत्कृष्ट कर्मनिष्ठा एवं दृढ़ संकल्प शक्ति में रचा-बसा था। हालात कितने ही विकट क्यों न हों, ‘वचस्येकं मनस्येकं कर्मेण्येकं हि महात्मनाम’ ही उनका एकमात्र सिद्धांत रहा।

तत्कालीन हिंदू समाज में स्त्रियों को पर्दा प्रथा में जीना पड़ता था। श्रद्धानंद ने इस कुरीति की दृढ़ता के साथ उन्मूलन की शुरुआत अपने परिवार से ही की। साथ ही स्त्री शिक्षा की शुरुआत पत्नी को ही शिक्षित करके की। गुण, कर्म व स्वभाव के दृष्टिगत अंतरजातीय विवाह करने की जो राह उनके गुरु महर्षि दयानंद ने दिखाई थी, उसका भी अक्षरश: पालन किया। स्वयं अपने परिवार और निकट संबंधियों के तीव्र विरोध के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों के अंतरजातीय विवाह किए। अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रसिद्ध क्रांतिकारी हरिश्चंद्र का विवाह तो उन्होंने एक विधवा के साथ कर, उस समय एक साहसिक उदाहरण व आदर्श प्रस्तुत किया था। यह उनका दृढ़ संकल्प एवं विचार था कि अगर जातिवाद की जकड़न को तोड़कर समाज में सौहार्द, समरसता और एकता का प्रसार करना है तो अंतरजातीय विवाह एक सशक्त अवधारणा है।

मिटा दिए सभी भेद

स्वामी श्रद्धानंद का शिक्षा दर्शन आर्थिक व सामाजिक भेदभाव से विहीन रहा। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, गुरुकुल फरीदाबाद, गुरुकुल कुरुक्षेत्र जैसे शिक्षण संस्थान खोले, जिनमें जाति, वर्ग, संप्रदाय, मजहब, भाषा व गरीब-अमीर के भेद के बिना सभी को समान शिक्षा दी जाती थी। उन्होंने नियम बनाया था कि किसी भी छात्र के नाम के पीछे परिवार, कुल, गोत्र आदि नहीं लगाया जाएगा। छुआछूत व अस्पृश्यता को मिटाना उनके जीवन का प्रमुख आंदोलन रहा। इसे आगे बढ़ाने और सशक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1913 में ‘दलितोद्धार सभा’ की स्थापना की और स्वयं इसके अध्यक्ष रहे। इस कार्य में उन्हें सेठ जुगल किशोर बिड़ला का विशेष सहयोग मिला।

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