बदलते हुए हालात में घात लगाने में माहिर गुलदार पर गंभीर हुई राज्य सरकार

राज्य में वन्य जीवों के कुल हमलों में 80 फीसद से ज्यादा की घातक हिस्सेदारी गुलदारों की ही है।
Publish Date:Tue, 20 Oct 2020 11:40 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

देहरादून, कुशल कोठियाल। वन्य जीवों के मामले में देश भर में उत्तराखंड का नाम भले ही बाघों की संख्या को लेकर लिया जाता हो, लेकिन प्रदेश में सुर्खियों में गुलदार ही रहता है। दरअसल यह एक ऐसा वन्यजीव है, जिसकी चहलकदमी प्रदेश भर में कहीं भी, और कभी भी हो सकती है। इस वन्य जीव का खौफ राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों में सूरज डूबने के साथ ही शुरू हो जाता है। इसके लिए न तो कोई भौगोलिक सीमा है और न ही समय की पाबंदी। चिंता की बात यह है कि राज्य में वन्य जीवों के कुल हमलों में 80 फीसद से ज्यादा की घातक हिस्सेदारी गुलदारों की ही है। राज्य के निवासियों के लिए बड़ी चिंता का विषय यह है कि बदलते हुए हालात में घात लगाने में माहिर गुलदार गांवों और बस्तियों के आप-पास रहना अधिक पसंद कर रहा है।

उत्तराखंड में पिछले डेढ़ माह में गुलदार के हमलों में नौ लोग मारे गए और आठ घायल हुए हैं। इसी दौरान तीन आदमखोर गुलदार भी वन विभाग के अधिकृत शिकारियों द्वारा मारे जा चुके हैं। हालांकि इनके शिकार करने की घटना पर वन्य प्रेमियों ने चिंता भी जताई है, जताई भी जानी चाहिए, लेकिन पहाड़ों में सूरज ढलते ही घरों में दुबकने के लिए मजबूर व दिनभर भय के माहौल में दिनचर्या पूरी करने वाले ग्रामीणों की स्थिति भी चिंता का विषय होना चाहिए। यह आवाज अब हिमालयी राज्यों में आम हो रही है। अब चिंता तो यह होनी चाहिए कि इस तरह के हालात कहीं मानव-वन्यजीव संघर्ष को किसी खतरनाक मोड़ पर न ले जाएं।

सरकारी महकमे गुलदार के इस व्यवहार से कितने चिंतित है, इसका अंदाजा इस तथ्य से ही लग जाता है कि राज्य में पिछले 12 वर्षो से गुलदार की गणना ही नहीं हुई। वर्ष 2008 में हुई अंतिम गणना में गुलदार की संख्या 2,335 बताई गई थी। वन्य प्राणी प्रेमियों का एक तबका तो इस लापरवाही के कुछ और ही मायने निकाल रहा है। उसके अनुसार गुलदारों की संख्या लगातार घटती जा रही है और वनों में फूड चेन गडबड़ाने के कारण बेचारे गुलदारों को बसावट की ओर रुख करना पड़ रहा है। कुछ तो इसे गुलदारों के प्राकृतिक वासों में मानवीय अतिक्रमण का परिणाम मान रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर इस संबंध में राज्य की जमीनी हकीकत से परिचित लोगों का कहना है कि उत्तराखंड में पहाड़ी इलाकों से भारी संख्या में पलायन हुआ, जिस कारण बड़ी संख्या में गांव जंगल में तब्दील हो गए हैं। जो लोग अपने घरों में ही आबाद नहीं हैं, वे गुलदारों के प्राकृतिक वासों में कैसे अतिक्रमण कर सकते हैं। इन लोगों की धारणा के अनुसार पहाड़ी गांवों से भारी संख्या में पलायन होने के कारण ही गुलदार निडर होकर गांवों में घूम रहे हैं। गांवों और बस्तियों में कुत्ते, मवेशी और बच्चों का आसान (प्रतिरोध न करने वाला) शिकार उपलब्ध होने के कारण गुलदार के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। जंगलों में जानवरों के शिकार के लिए जूझने के बजाय बसावट में घात लगाना ज्यादा आसान है।

विज्ञान के दृष्टिकोण से अध्ययन : गुलदारों के व्यवहार पर अब जाकर वन विभाग ने विज्ञान के दृष्टिकोण से अध्ययन करने व गणना करने का निर्णय लिया है। कुछ हद तक इस पर काम भी शुरू हो गया है। गुलदार के बदलते व्यवहार का विज्ञान के नजरिये से अध्ययन करने के लिए वन विभाग अब कुछ गुलदारों पर रेडियो कॉलर लगा कर उसकी आवाजाही का अध्ययन करने जा रहा है। हाल ही में हरिद्वार क्षेत्र में एक गुलदार पर यह परीक्षण किया गया है। कॉलर लगाने के बाद उसे आबादी से दूर घने जंगल में छोड़ा गया। लगभग 15 दिनों में यह पाया गया कि वह चार बार बस्ती के करीब आ चुका है। अभी यह अध्ययन जारी है, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि महकमे की इस कसरत से गुलदार की व्यवहारगत गुत्थियों को सुलझाने में कामयाबी हासिल की जा सकती है।

इस अध्ययन के परिणामों से मानव को गुलदार के साथ सह अस्तित्व बनाने की दिशा में ठोस उपाय भी मिलेंगे। इसके अलावा राज्य में गुलदारों की गणना करने का निर्णय भी लिया गया है। दिसंबर माह में पूरे प्रदेश में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने की संभावना है। वन विभाग के कर्मियों के साथ ही विश्वविद्यालयों में वानिकी का अध्ययन कर रहे छात्रों को भी इस कार्य में लगाए जाने के बारे में विचार हो रहा है।

[राज्य संपादक, उत्तराखंड]

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