हेस्को के संस्थापक पद्मभूषण डा. अनिल जोशी, 33 साल पुरानी वन नीति पर पुनर्विचार की जरूरत

33 साल पुरानी वन नीति पर पुनर्विचार की जरूरत।

हेस्को के संस्थापक पद्मभूषण डा.अनिल जोशी ने आग समेत अन्य कारणों से वनों को पहुंच रही भारी क्षति के मद्देनजर वन नीति पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। उन्होंने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर वन नीति से जुड़े विभिन्न बिंदुओं की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट कराया।

Raksha PanthriTue, 13 Apr 2021 02:19 PM (IST)

राज्य ब्यूरो, देहरादून। हिमालयी पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (हेस्को) के संस्थापक पद्मभूषण डा.अनिल जोशी ने आग समेत अन्य कारणों से वनों को पहुंच रही भारी क्षति के मद्देनजर वन नीति पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है। डा. जोशी ने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर वन नीति से जुड़े विभिन्न बिंदुओं की तरफ उनका ध्यान आकृष्ट कराया है। साथ ही व्यापक चर्चा के बाद नीति को वन एवं जन के लिहाज से लाभकारी बनाने को निर्देशित करने का प्रधानमंत्री से आग्रह किया है।

पर्यावरणविद् डा. जोशी ने पत्र में कहा है कि जलवायु परिवर्तन, समय पर वर्षा न होने और साधनों के अभाव जैसे कारणों से आग से वनों को भारी क्षति पहुंचा रही है। हिमालय के वनों की क्षति को राष्ट्रीय क्षति के रूप में देखा जाना चाहिए। वजह ये कि देश की हवा, मिट्टी व पानी में हिमालय का प्रमुख योगदान है। इस क्रम में वर्ष 1988 की वन नीति पर पुनर्विचार समय की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि अगर वन नीति वनों के पर्याप्त विस्तार प्रबंधन में अक्षम रही है तो इसके कारणों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इस नीति के अनुसार राज्य में 33 फीसद वन होने चाहिए, जबकि पहाड़ों में 65 प्रतिशत। उन्होंने कहा कि क्या हम इस नीति के जरिये इन लक्ष्यों तक पहुंच पाए, क्या पिछले 33 वर्षों में यह वनों को बेहतर पाई, आग लगने की घटनाओं को रोक पाई, ऐसे तमाम सवाल चिंता बढ़ा रहे हैं।

डा. जोशी ने कहा कि वनों की आग के प्रति गांवों की सामुदायिक भागीदारी एक गंभीर विषय बन चुका है। एक दौर में गांव दावानल से लड़कर जीत जाते थे, मगर आज इस भागीदारी का अभाव दिख रहा है। उन्होंने कहा कि वन जल, मिट्टी व वायु के स्रोत हैं। इनके घटते-मरते हालात देश को बड़े संकट की ओर धकेल देंगे। इसलिए इनकी सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 12 हजार से अधिक वन पंचायतें हैं, मगर वन प्रबंधन में उनकी भागीदारी उत्साहपूर्ण नहीं है। 

वन पंचायतों को नई तर्ज व शैली में पर्याप्त प्रोत्साहन देकर गांवों के हर दर्जे के वनों के रखरखाव से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि वनों में आग की बड़ी वजह पतझड़ और खरपतवार भी हैं। पूर्व में ग्रामीण इन पत्तियों का उपयोग मवेशियों के लिए बिछौना बनाने में कर उससे खाद बनाते थे। बाद में यह परंपरा आगे नहीं बढ़ सकी, जबकि यह एक बड़ी संपदा है। हिमालयी शोध संस्थानों को इस पर गंभीरता दिखानी होगी।

पत्र में चीड़ वनों के पारिस्थितिकीय परिवर्तन को भी चुनौती करार दिया गया है। कहा गया है कि इस बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है। चीड़ वनों में वर्षा जल संरक्षण के लिए जलछिद्र व जलकुंड बनाकर पारिस्थितिकी परिवर्तन संभव है। साथ ही जल संरक्षण के पारंपरिक तौर-तरीकों खाल-चाल पर जोर देना होगा।

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