सत्ता के गलियारे से : पूर्व मुख्यमंत्री बोले, पहले अनुभव लो मंत्रीजी

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत। फाइल फोटो

कई दफा कुछ नेताओं की जबान फिसल जाती है लेकिन अकसर ऐसा भी होता है कि नेता जानते-बूझते जबान फिसलने देते हैं। ऐसा ही कुछ हाल में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के साथ हुआ। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री पर उनके कार्यकाल को लेकर एक टिप्पणी की।

Sunil NegiMon, 17 May 2021 07:05 AM (IST)

विकास धूलिया, देहरादून। कई दफा कुछ नेताओं की जबान फिसल जाती है, लेकिन अकसर ऐसा भी होता है कि नेता जानते-बूझते जबान फिसलने देते हैं। ऐसा ही कुछ हाल में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के साथ हुआ। उन्होंने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर उनके कार्यकाल को लेकर एक टिप्पणी की, लेकिन इस पर जिस तरह की प्रतिक्रिया त्रिवेंद्र की तरफ से आई, वह सबके लिए अप्रत्याशित रही। त्रिवेंद्र ने बगैर हिचके कैबिनेट मंत्री जोशी को अनुभवहीन करार दिया। उन्होंने कहा, सात-आठ महीने मंत्री को विभाग को समझने में लगते हैं। साथ ही यह कहना भी नहीं भूले कि जिस मसले पर जोशी ने टिप्पणी की, वह उनके महकमे से संबंधित ही नहीं है। त्रिवेंद्र की जिस तरह की छवि है, पलटवारनुमा यह जवाब पार्टी के उन नेताओं के लिए साफ संकेत है, जो पद से हटने के बाद उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते रहे हैं।

अब कांग्रेस द्वार-द्वार, घर का कब उपचार

सूबे में विधानसभा चुनाव को चंद महीने शेष हैं। ऐसे में विपक्ष कांग्रेस को लगने लगा है कि कोरोना चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा। यही वजह है कि पार्टी अब जाकर संक्रमण से निबटने को मैदान में उतर गई है। सालभर तक तो कांग्रेस महज बयानबाजी के बूते सरकार पर हमलावर रही। उधर, सत्तारूढ़ भाजपा शुरुआत से ही सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कोरोना की रोकथाम और राहत कार्यों में जुटी हुई है। हालात भांपकर कांग्रेस ने अब अपनी रणनीति में तब्दीली की है। पार्टी ने संक्रमितों को घरों में आक्सीजन सिलिंडर की आपूर्ति के साथ ही मुफ्त एंबुलेंस सेवा प्रारंभ की है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने द्वार-द्वार उपचार कार्यक्रम भी शुरू किया है, ताकि इसके सहारे जनता के दिलों में दस्तक दी जा सके। कांग्रेस द्वार-द्वार तो जा रही है, लेकिन असल चिंता पार्टी नेताओं को यह है कि अपने घर का कलह कब शांत होगा।

वातानुकूलित कक्ष में आइसोलेट नेताजी की चिट्ठी

सवा साल से कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद डेढ़ महीने पहले लगा कि अब कोरोना की विदाई हो गई, मगर दूसरी लहर पर सवार संक्रमण ने तमाम राज्यों की तरह उत्तराखंड पर भी कहर बरपा रखा है। हर कोई खैर मना रहा है तो भला मंत्री और विधायक भी कैसे पीछे रहें। अंतत: मुख्यमंत्री को इन्हें जिलों के मोर्चे पर तैनात करने के आदेश देने पड़े, तो भाजपा संगठन ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर विधायकों की परफार्मेंस की पैमाइश को कोराना काल में किए गए कार्यों को ही पैमाना बना दिया। मरता, क्या न करता, पार्टी को दिखाने के लिए अब अजब-गजब हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। कई नेता अपने सरकारी घर के वातानुकूलित कक्ष में आइसोलेट होकर केंद्र के मंत्रियों को चिट्ठी लिख मदद की गुहार लगा रहे हैं। मदद मिले न मिले, लेकिन इससे मीडिया के जरिये फ्रंट पर तैनाती की चर्चा तो हो रही है।

स्वयंभू स्वास्थ्य मंत्री और कौशिक की नसीहत

भाजपा को अनुशासित पार्टी माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड में चुनावी साल में भाजपा के नेता कुछ उतावले नजर आ रहे हैं। मंत्री अपने पूर्व मुख्यमंत्री पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो विधायक मंत्रियों की मंशा पर। एक मंत्री तो ऐसे हैं, जो स्वयंभू स्वास्थ्य मंत्री बन बैठे हैं। इनका निजी स्टाफ जो प्रेस नोट जारी करता है, उसमें लिखा होता है कि वह स्वास्थ्य मंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय मुख्यमंत्री के पास है, तो नेताजी को मुगालता है कि नंबर दो वही हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा 70 में से 57 सीटें जीतकर सत्ता की दहलीज तक पहुंची, मगर चार साल बाद आलम यह कि संगठन के मुखिया मदन कौशिक को मंत्री-विधायकों को संयम बरतने की नसीहत देनी पड़ रही है। कौशिक भी क्या करें, एक साल पहले जिम्मा मिला, अगले विधानसभा चुनाव में खुद को लायक साबित भी तो करना है।

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