चार धाम के सदियों पुराने मार्गों की खोज, पर्यटन को प्रोत्साहन देने की दिशा में अहम कदम

प्रदेश की सरकार चार धाम के सदियों पुराने पैदल मार्गों की खोज करा रही है। यह प्रयास सराहनीय है बशर्ते योजना अपनी मंजिल तक पहुंच सके। एक दल 50 दिन में 1200 किलोमीटर की यात्राा कर उन सदियों पुराने मार्ग को खोजेगा जो अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं।

Neel RajputWed, 27 Oct 2021 03:01 PM (IST)
यह दल 50 दिन में 1200 किलोमीटर की यात्राा कर सदियों पुराने मार्गों को खोजेगा

देहरादून, राज्य ब्यूरो। उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन को विकसित करने के लिए सरकार विभिन्न स्तर पर प्रयास कर रही है। यह सर्वविदित है कि पर्यटन प्रदेश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए सबसे सशक्त माध्यम है। सरकार को अहसास है कि आत्मनिर्भर उत्तराखंड के सपने को पूरा करने के लिए पर्यटन को प्रोत्साहन देना जरूरी है। इसी के तहत प्रसिद्ध चार धाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के पुराने पैदल मार्गों की तलाश के लिए 25 सदस्यीय दल रवाना किया गया है।

बताया गया है कि यह दल 50 दिन में 1200 किलोमीटर की यात्राा कर उन सदियों पुराने मार्ग को खोजेगा, जो अब अपना अस्तित्व खो चुके हैं। जानकारों के मुताबिक, चार धाम यात्रा मार्ग पर एक जमाने में 80 चट्टियां (यात्रियों के लिए विश्रम स्थल) होती थीं। इन स्थानों पर बाबा काली कमली ने धर्मशालाओं का निर्माण भी कराया था, लेकिन यात्रा के आधुनिक साधन विकसित होते ही इनमें से ज्यादातर चट्टियों का अस्तित्व समाप्त हो गया। बताया जा रहा है कि वर्तमान में महज 30-32 चट्टियां ही रह गई हैं। यह अभियान दल ऐसे ही स्थानों के बारे में जानकारी जुटाकर सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा।

नि:संदेह सरकार के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। इससे न केवल साहसिक पर्यटन को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि वर्षों पुराने मार्गों के संरक्षण की दिशा में कदम उठाए जा सकेंगे। इन मार्गों के अस्तित्व में आने से यात्रा पर आने वाले लोग प्रदेश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से भी परिचित होंगे। इससे राजस्व के स्रोत भी बढ़ेंगे। दरअसल चार धाम यात्रा के पुराने पैदल मार्गों की खोज का यह विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा के बाद से ही कवायद शुरू कर दी गई थी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि आपदा के दौरान जब गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ जाने वाले मुख्य मार्ग ध्वस्त हो गए तो इन्हीं सदियों पुरानी पगड़डियों के भरोसे ही हजारों लोगों के जीवन को बचाया जा सका। यही वजह है कि तब सरकार इन मार्गों का पता लगाकर इन्हें आपातकालीन रास्तों के साथ ही पर्यटन के लिए भी विकसित करना चाहती थी। बाद में इसी कड़ी में एक दल भी केदारनाथ भेजा गया था, लेकिन इसके बाद क्या हुआ इस बारे में शायद ही कोई कुछ बता सके।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार के स्तर पर अच्छी योजनाएं बनाई जाती हैं। बस, जरूरत इन योजनाओं को ईमानदारी से लागू करने की है। उम्मीद है कि अभियान दल की रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार इन रास्तों को न केवल दुरुस्त करेगी, बल्कि यहां जल्द से जल्द मूलभूत सुविधाएं भी जुटाएगी।

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