उत्तराखंड में हिमालय के गर्म पानी के झरनों से बनेगी बिजली, यहां लगेंगे जियोथर्मल इनर्जी प्लांट

उत्‍तराखंड में तपोवन में जियोथर्मल तकनीक के माध्यम से गर्म पानी के झरने का तापमान मापने के दौरान का चित्र।
Publish Date:Wed, 23 Sep 2020 09:21 AM (IST) Author: Sunil Negi

देहरादून, सुमन सेमवाल। अभी सिर्फ पर्यावरण में कार्बन डाईऑक्साइड बढ़ाने की वजह बन रहे हिमालय के गर्म पानी के झरने अब बिजली उत्पादन में भी सहायक होंगे। इसके लिए वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने जियोथर्मल तकनीक के आधार पर न सिर्फ ऐसे झरनों की खोज की है, बल्कि ग्रीन इनर्जी के रूप में जियोथर्मल इनर्जी का प्लांट स्थापित करने की तैयारी भी कर ली है। संस्थान ने पावर प्लांट लगाने के लिए उत्तराखंड की जयदेवम इनर्जी प्रा. लि. कंपनी के साथ एमओयू किया है। प्लांट की क्षमता पांच मेगावाट की होगी और यह हिमालयी क्षेत्र का पहला जियोथर्मल इनर्जी प्लांट भी होगा।

वाडिया संस्थान के निदेशक डॉ. कालाचांद साई ने बताया कि पावर प्लांट लगाने के लिए चमोली के जोशीमठ स्थित तपोवन के झरने को चुना गया है। यहां पर सतह का तापमान करीब 93 डिग्री सेल्सियस है, जबकि जमीन के भीतर यही तापमान 150 डिग्री सेल्सियस तक है। पावर प्लांट लगाने के लिए जमीन में करीब 400 मीटर तक ड्रिल किया जाएगा। इससे गर्म पानी अधिक फोर्स के साथ बाहर निकलेगा। प्लांट के जरिये गर्म पानी की भाप से बिजली तैयार की जाएगी। पानी को महज 70 डिग्री तापमान में ही उबालने वाली स्थिति में पहुंचाने वाले प्रोपेन व बाइनरी लिक्विड के मिश्रण का प्रयोग किया जाएगा। इससे पहले से अधिक गर्म पानी बिजली उत्पादन के लिए जल्द अधिक भाप पैदा करेगा।

निदेशक डॉ. कालाचंद ने बताया कि संस्थान जियोथर्मल इनर्जी की दिशा में 10 साल से शोध कर रहा था। जियोथर्मल तकनीक के जरिये इस काम को अंजाम देने में संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. संतोष कुमार राय व डॉ. समीर के तिवारी ने अहम भूमिका निभाई। वहीं, एमओयू पर हस्ताक्षर वाडिया के रजिस्ट्रार पंकज कुमार व जयदेवम कंपनी के निदेशक डॉ. मनोज कोहली ने किए। प्रोजेक्ट तैयार करने की अवधि पांच साल रखी गई है।

स्रोत किया जाता रहेगा रीचार्ज

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. कालाचांद साई ने बताया कि इस तरह के स्रोत दशकों तक सुरक्षित रहते हैं। फिर भी बिजली बनाने के लिए अधिक मात्रा में पानी बाहर निकले, लिहाजा स्रोत को रीचार्ज करने के लिए वैज्ञानिक विधि से इसके पास दो बोरिंग की जाएगी। इनके माध्यम से स्रोत को निरंतर रीचार्ज करने का काम किया जाएगा। संस्थान के अध्ययन में यह भी पता चला है कि वर्ष 1970 में तपोवन के पानी का जो तापमान था, वही आज भी बरकरार है। इसके अलावा झरने से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड को पर्यावरण में मिलने से रोकने की दिशा में भी शोध कार्य किए जाने की तैयारी है। यहां के पानी में प्रतिलीटर 30 मिलीग्राम कार्बन डाईऑक्साइड निकल रहा है। 

उत्तराखंड में 20 मेगावाट तक उत्पादन का लक्ष्य

वाडिया संस्थान का लक्ष्य है कि इस प्रोजेक्ट के बाद अन्य झरनों में भी बिजली उत्पादन की संभावना तलाशी जाएगी। कुछ सर्वाधिक उपयुक्त झरनों की पहचान कर प्रदेश में जियोथर्मल तकनीक से 20 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है।

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पानी में बोरोन, हीलियम व लीथियम भी

झरने के पानी में बोरोन (600 से 30 हजार माइक्रो इक्यूवेलेंट), हीलीयम (90 मिलीग्राम प्रतिलीटर) व लीथियम (50 से 3550 माइक्रो इक्यूवेलेंट) जैसे तत्व भी हैं। संस्थान यह भी प्रयास कर रहा है कि विभिन्न प्रयोग के लिए इन्हें स्टोर किया जा सके। खासकर बोरोना की उपलब्धता के चलते इसके पानी का प्रयोग चर्म रोगों के उपचार में सहायक है। 

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मेन सेंट्रल थ्रस्ट में गर्म पानी के झरने

हिमालय के निर्माण के समय इंडियन व यूरेशियन प्लेट के टकराव से कुछ मेगाथ्रस्ट की अस्तित्व में आ गए। यह एक तरह की ऐतिहासिक फॉल्ट लाइन हैं, जो आज भी एक्टिव हैं। तपोवन में जो गर्म पानी की झरना है, वह मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) के अंतर्गत है। ऐसे स्थलों पर बारिश का पानी आसानी से भूगर्भ में चला जाता है, जहां का तापमान बेहद अधिक होने के चलते पानी गर्म हो जाता है। स्रोत के रूप में जब यही पानी बाहर निकलता है तो गर्म पानी का झरना कहलाता है। 

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