एक जमाने में राजधानी देहरादून के नाम से भी थी संसदीय सीट, पढ़िए पूरी खबर

देहरादून, विकास गुसाईं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नाम से भी एक जमाने में संसदीय सीट थी। यह सीट 1952 से लेकर 1971 तक वजूद में रही। 1977 में हरिद्वार लोकसभा सीट के अस्तित्व पर आने के बाद यह सीट खत्म हो गई। देहरादून का कुछ हिस्सा टिहरी गढ़वाल तो कुछ पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट में समाहित कर दिया गया। विशेष यह कि शुरू के तीन चुनावों में कांग्रेस के महावीर प्रसाद ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। 

इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो 1951-52 में हुए पहले लोकसभा चुनावों में देहरादून एक अलग संसदीय सीट थी। इसका पूरा नाम देहरादून जिला-बिजनौर जिला (उत्तर-पश्चिम)-सहारनपुर जिला सीट था। आजादी के बाद हुए पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के महावीर त्यागी को इस सीट से जीत मिली। इस चुनावों में कुल 51.30 फीसद मतदान हुआ था। उन्होंने भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी जेआर गोयल को हराया था। महावीर त्यागी को 63 फीसद तो जेआर गोयल को 13.81 फीसद वोट मिले थे। 

1957 के चुनावों में महावीर प्रसाद ने फिर से जीत हासिल की। इस चुनाव में 60 फीसद मतदान हुआ था। महावीर प्रसाद को 58.05 फीसद वोट मिले। दूसरे नंबर पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नारायण दत्त डंगवाल थे। उन्हें 24 फीसद मत मिले थे। 

1962 के चुनावों में महावीर प्रसाद ने लगातार तीसरी जीत हासिल की। इन चुनावों में 59.09 फीसद मतदान हुआ था। महावीर प्रसाद को 50.89 प्रतिशत वोट मिले। दूसरे स्थान पर भारतीय जनसंघ की प्रत्याशी सुशीला देवी रही। उन्हें 19.76 प्रतिशत वोट मिले। 1967 में हुए लोकसभा चुनावों में महावीर प्रसाद की जीत का सिलसिला टूटा। इस चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी यशपाल सिंह ने महावीर प्रसाद को शिकस्त दी। इसका एक कारण कम मतदान प्रतिशत भी रहा। इस चुनाव में केवल 32.64 प्रतिशत मतदान हुआ। इसमें यशपाल सिंह को 49.83 और महावीर प्रसाद को 36.64 प्रतिशत वोट मिले। 

1971 को कांग्रेस ने इस सीट से मुल्की राज सैनी को अपना प्रत्याशी बनाया। उन्होंने फिर से कांग्रेस को यह सीट दिलाई। इस चुनाव में सबसे अधिक 11 प्रत्याशी मैदान में थे। 53 फीसद लोगों ने इन चुनावों में मतदान किया। इसमें से मुल्की राज को 68.48 वोट मिले। दूसरे नंबर पर भारतीय जनसंघ के नित्यानंद स्वामी रहे। उन्हें कुल 17.51 फीसद वोट मिले। देहरादून संसदीय सीट का यह अंतिम मतदान भी रहा। इसके बाद नए परिसीमन से इस संसदीय सीट का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। 

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