Uttarakhand Assembly Elections 2022: कांग्रेस में दिग्गजों को साधने के लिए पांच अध्यक्षों का फार्मूला

Uttarakhand Assembly Elections 2022 उत्तराखंड में एक अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष के कांग्रेस के फार्मूले ने सभी को अचरज में डाल दिया है। जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को आधार बनाकर किए गए इस प्रयोग के जरिये पार्टी ने सबको साधने की कोशिश तो की ही है।

Sunil NegiSat, 24 Jul 2021 06:30 AM (IST)
उत्‍तराखंड में एक अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष के कांग्रेस के फार्मूले ने सभी को अचरज में डाल दिया है।

रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। Uttarakhand Assembly Elections 2022 उत्तराखंड जैसे भौगोलिक और जनसंख्या की दृष्टि से छोटे राज्य में एक अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष के कांग्रेस के फार्मूले ने सभी को अचरज में डाल दिया है। जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को आधार बनाकर किए गए इस प्रयोग के जरिये पार्टी ने सबको साधने की कोशिश तो की ही है, साथ ही किसी गुट विशेष के वर्चस्व की वजह से आगामी चुनाव के मौके पर मचने वाली संभावित भगदड़ को रोकने का बंदोबस्त भी किया है। अब लंबे समय से एकदूसरे को आंख दिखाते रहे नेताओं को हाईकमान ने एक ही कश्ती में बैठा भी दिया और कश्ती को पार लगाने का जिम्मा भी सौंप दिया है।

पंजाब के जिस फार्मूले को उत्तराखंड में कांग्रेस ने आजमाया है, वह क्षेत्रीय व जातीय संतुलन में तालमेल बैठाने से ज्यादा अब दिग्गजों को साधने की कोशिश में बदल गया है। विधानसभा चुनाव से महज छह महीने पहले नए फार्मूले को आगे करने के पीछे पार्टी की मंशा प्रदेश में लंबे समय से चल रही खींचतान पर अंकुश लगाने की ज्यादा रही है। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ी बगावत से जूझना पड़ा था। 10 विधायकों के पार्टी छोड़ने का नतीजा ये हुआ कि 2017 में पार्टी को विधानसभा में महज 11 की संख्या पर सिमट जाना पड़ा था।

नए फार्मूले से ये साबित हो गया है कि पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व पिछली दफा हुई बड़ी बगावत को भूल नहीं सका है। लिहाजा किसी गुट विशेष के हाथों में शक्ति केंद्रित होने के खतरे को पहले भांपते हुए पार्टी ने पांच अध्यक्षों के जरिये पार्टी के अंदरूनी संतुलन को साधने को ज्यादा तरजीह दी है। 2022 का चुनाव उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए करो या मरो सरीखा हो गया है। राज्यों में तेजी से सिमट रही कांग्रेस को उत्तराखंड से अब भी आस है। अब होने वाली कोई भी फूट सत्तारूढ़ भाजपा के लिए तो बड़ा अवसर साबित हो ही सकती है, साथ में किसी भी नए दल को पांव जमाने का मौका दिला सकती है।

ऐसे में पार्टी ने सबकी सुनी और सबकी मानी भी, लेकिन नई लीक खींचकर सभी को साथ चलने को मजबूर कर दिया। अब एक के बजाय पांच अध्यक्षों के फार्मूले में होने वाली खींचतान सिर्फ पार्टी ही नहीं, दिग्गजों के सियासी भविष्य के लिए भी बड़ा खतरा साबित हो सकती है। कश्ती डूबी तो सत्ता के साथ पार्टी के भीतर भी मुश्किलें बढ़ना तय है। जीत के फार्मूले की तलाश में पार्टी ने डर को भी सियासी समीकरण का हिस्सा बना दिया।

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