उत्‍तराखंड: नन्हे हाथों में मांगों का बोझ, जानिए कहां का है मामला

ज्य के पर्वतीय इलाकों में सड़क और पुल का टोटा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन जब खेलकूद में व्यस्त रहने वाले नन्हे पांव भी सड़क और पुल की मांग करते हुए जुलूस में कदमताल करने को मजबूर हो जाएं तो साफ है कि दर्द।

Sumit KumarWed, 01 Dec 2021 03:53 PM (IST)
जुवा, बंगला और भैड़ गांव के बच्चों के हाथ में किताबों की जगह बैनर व तख्तियों ने ले ली।

विजय मिश्रा, देहरादून। राज्य के पर्वतीय इलाकों में सड़क और पुल का टोटा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन, जब खेलकूद में व्यस्त रहने वाले नन्हे पांव भी सड़क और पुल की मांग करते हुए जुलूस में कदमताल करने को मजबूर हो जाएं तो साफ है कि दर्द, उसे सहने की सीमा के अंतिम छोर तक पहुंच गया है। वाकया पौड़ी जनपद का है। यहां दुगड्डा ब्लाक के जुवा, बंगला और भैड़ गांव के बच्चों के हाथ में रविवार को किताबों की जगह बैनर व तख्तियों ने ले ली।

हर वक्त चटर-पटर खाने को लालायित रहने वाले नौनिहाल दिनभर अनशन पर बैठे रहे। मांग थी लंगूरगाड नदी पर पुल के निर्माण की। वैसे तो पुल निर्माण के लिए नदी के तट पर ग्रामीणों का अनशन 20 दिन से चल रहा है। मगर, जन आंदोलन के गर्भ से जन्मे राज्य की भावी पीढ़ी के हाथ में मांगों का यह बोझ बेहद दुखद है।

कब साकार होंगे वायदों के मेले

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...। कवि जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषीÓ की यह पंक्ति इस रविवार को 26/11 के हमले में शहीद हुए अशोक चक्र विजेता गजेंद्र सिंह बिष्ट के दून स्थित आवास में ताजा हो गई। शहीद की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री समेत तमाम राजनेता यहां श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचे। इससे शहीद के परिवार का दुख भले न कम हो, गर्व का एहसास तो होता ही है। हालांकि, हर शहीद के परिवार की स्थिति इतनी सुखद नहीं है। इसी रोज की बात है। दून के ही गांधी पार्क में एक अन्य शहीद संदीप सिंह रावत का परिवार धरने पर बैठा था। टटोलने पर पता चला कि संदीप की शहादत पर सरकार ने परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वायदा किया था, जो पांच साल बाद भी पूरा नहीं हुआ। सारांश यह कि वीरभूमि में हर शहादत के सम्मान के लिए अभी काफी प्रयास किए जाने बाकी हैं।

हम भी खुश, तुम भी खुश

उत्तराखंड में इन दिनों मौसम और सियासी गलियारों का हाल एक-सा है। पहले बात मौसम की, आबोहवा में ठंड का प्रवाह लगातार बढ़ रहा है, इससे दिन में चटख धूप भी अब गर्मी का एहसास नहीं करा पा रही। ऐसा ही कुछ हाल सियासी गलियारों का है। सरकार की एक के बाद एक मोर्चेबंदी से विपक्ष के तेवर ठंडे पड़ते जा रहे हैैं। पहले केंद्र सरकार ने कृषि कानून वापस लेकर पछाड़ा तो अब मुख्यमंत्री ने गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाकर मास्टर स्ट्रोक खेल दिया। दो वर्ष से सरकार और तीर्थ पुरोहितों के बीच चल रहा गतिरोध भी मंगलवार को आखिरकार खत्म होने की दिशा में अंतिम पग की तरफ बढ़ गया। एक साथ इतने झटके लगने से विपक्ष की पेसानी पर बल पडऩा लाजिमी है। खैर, किसान और तीर्थ पुरोहित खुश हैं। भाजपा भी एक कदम पीछे खींचकर विपक्ष को दो कदम पीछे धकेल मन ही मन मुस्करा रही है।

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फिर से सतर्क होने की बारी

उत्तराखंड में मई में अपना चरम रूप दिखा चुके कोरोना वायरस के नए वैरियंट ओमिक्रोन ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। इसको लेकर सरकार के साथ शासन और प्रशासन सुरक्षा की दिशा में सक्रिय हो गए हैं। मगर, सिस्टम की यह गंभीरता तब तक कारगर साबित नहीं होगी, जब तक बेफिक्री के छेदों को रफू नहीं किया जाएगा। दरअसल, कोरोना से बचाव के लिए चेहरे पर मास्क बरकरार रहे, इसके लिए शासन-प्रशासन ने क्या जतन नहीं किए। जुर्माना लगाया। मुफ्त मास्क बंटवाए। मुकदमा दर्ज कराया। मगर, सब बेकार। आज भी बाजार में तमाम लोग बिना मास्क के घूमते दिख रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनका किसी से बात करते वक्त मास्क कान पर टंगा या ठुड्ढी पर अटका होता है। इस बेफिक्री को दूर करना होगा। एक संदेश जनता-जनार्दन के लिए भी है कि ढील का फायदा उठाकर दिल को आल इज वेल का संदेश मत सुनाइये।

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