देवस्थानम बोर्ड के बाद अब विपक्ष के निशाने पर भू-कानून, मुख्यमंत्री ने दिए भूमि कानून पर पुनर्विचार के संकेत

प्रदेश सरकार देवस्थानम बोर्ड को रद करने का निर्णय कर चुकी है इससे भूमि कानून का विरोध कर रहे व्यक्ति उत्साह में हैं कांग्रेस ने भी अब मौजूदा भूमि कानून को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है सरकार विपक्ष के हाथ से मुद्दे छीन रही है।

Sunil NegiTue, 07 Dec 2021 02:05 AM (IST)
उत्तराखंड में देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड अधिनियम रद करने के फैसले के बाद अब विपक्ष के निशाने पर भूमि-कानून है।

रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। उत्तराखंड में देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड अधिनियम रद करने के फैसले के बाद अब विपक्ष के निशाने पर भूमि-कानून है। इस कानून को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिशें तेज की जा रही हैं। उधर मौजूदा भूमि कानून पर पुनर्विचार को लेकर गठित उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट का सरकार को इंतजार है। माना जा रहा है कि चुनाव से पहले विपक्ष के हाथ से लगातार मुद्दे छीन रही धामी सरकार भूमि कानून में संशोधन कर सकती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी यह संकेत दिए हैं।

प्रदेश में भूमि कानूनों में किए गए संशोधनों का विरोध शुरू हो चुका है। इन संशोधनों को रद कर सख्त भू-कानून लागू करने की मांग को लेकर गोलबंदी शुरू हो चुकी है। दरअसल राज्य में पूंजी निवेश को बढ़ावा देने और उद्योगों को प्राेत्साहित करने का हवाला देकर भूमि कानूनों में संशोधन किया गया। इसके बाद कृषि भूमि के अन्य उपयोग खासतौर पर कंक्रीट के जंगल पनपने से बुद्धिजीवी भी चिंतित नजर आ रहे हैं। भूमि कानून को लेकर जनता में असंतोष बढ़ने से विपक्षी दल भी इसके खिलाफ लामबंद हो चुके हैं। कांग्रेस तो यह घोषणा कर चुकी है कि 2022 के चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनने पर भूमि कानून को रद किया जाएगा।

देवस्थानम बोर्ड के बाद अब भू-कानून पर दबाव

सरकार दबाव की वजह से ही चार धाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड अधिनियम रद करने का फैसला कर चुकी है। विपक्षी दलों का हौसला इससे बढ़ा है। गैर भाजपाई दलों का मानना है कि सरकार को देर-सबेर भूमि कानून को भी रद करना पड़ेगा। वर्तमान में उत्तरप्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था सुधार अधिनियम, 1950 (अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश 2001) (संशोधन) अधिनियम-2018 के मुताबिक राज्य से बाहर के व्यक्ति को आवासीय उपयोग के लिए 250 वर्गमीटर भूमि खरीदने की अनुमति है। कृषि भूमि खरीदने की अनुमति नहीं है, लेकिन नए संशोधनों के बाद सरकार ने 12.5 एकड़ से ज्यादा भूमि खरीदने की सशर्त अनुमति मिल चुकी है। कृषि, वानिकी के साथ ही शिक्षण संस्थान खोलने, ऊर्जा व पर्यटन से संबंधित उद्योग व व्यवसाय के लिए भूमि की खरीद हो सकती है। भू-कानून में इस संशोधन के बाद जमीन की खरीद-फरोख्त तेज हुई है। भू कानून का विरोध करने वालों का तर्क है कि इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। कृषि भूमि अथवा अन्य व्यवसायिक उपयोग बताकर खरीदी जाने वाली भूमि का लाभ कास्तकारों को नहीं मिल रहा है।

पूंजी निवेश की राह खोलने को बना नया कानून

हालांकि भूमि कानून का हर कोई विरोध कर रहा है, ऐसा भी नहीं है। बुद्धिजीवियों, नौकरशाहों और उद्यमियों का मानना है कि भू-कानून में संशोधन से राज्य में निवेश को आमंत्रित करने की राह तैयार हुई है। वर्ष 2017 में भू-कानून में अहम संशोधन किया। बगैर अनुमति भूमि की खरीद 250 वर्गमीटर तक बहाल रखी गई है। संशोधित भूमि अधिनियम में कृषि, बागवानी, उद्योग, पर्यटन, ऊर्जा समेत विभिन्न व्यावसायिक व औद्योगिक उपयोग के लिए भूमि खरीद का दायरा 12.5 एकड़ से बढ़ाकर 30 एकड़ तक किया गया। कुछ मामलों में 30 एकड़ से ज्यादा भूमि खरीदने की व्यवस्था भी है। नए कानून में भूमि खरीदने में शासन से अनुमति की व्यवस्था के स्थान पर जिलाधिकारी को यह अधिकार दिया गया है। साथ ही नगर निगम और नगरपालिका परिषद क्षेत्र में बगैर अनुमति भूमि खरीदने की व्यवस्था लागू की गई है।

उच्च स्तरीय समिति कर रही है पुनर्विचार

भूमि कानून को लचीला बनाने के खिलाफ राज्य में आंदोलन मुखर है। इस संवेदनशील मामले में सरकारें फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ाती रही हैं। मौजूदा भूमि कानून का विरोध होने पर सरकार इस पर पुनर्विचार के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित कर चुकी है। पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में गठित समिति इस मामले में आम जन व संबंधित पक्षों से सुझाव आमंत्रित कर चुकी है। समिति को अब तक 160 से ज्यादा सुझाव मिल चुके हैं। समिति की इसी पखवाड़े होने जा रही बैठक में इन सुझावों पर मनन किया जाएगा। माना जा रहा है कि समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप सकती है। इसके बाद भूमि कानून को वापस लेने की प्रक्रिया प्रारंभ हो सकेगी।

हिमाचल की तर्ज पर भू-कानून की पैरवी

उत्तराखंड में हिमाचल की तर्ज पर भूमि अधिनियम लागू करने की मांग की जा रही है। हिमाचल में कृषि भूमि खरीदने की अनुमति तब ही मिल सकती है, जब खरीदार किसान ही हो और हिमाचल में लंबे अरसे से रह रहा हो। हिमाचल प्रदेश किराएदारी और भूमि सुधार अधिनियम, 1972 के 11वें अध्याय 'कंट्रोल आन ट्रांसफर आफ लैंड' की धारा-118 के तहत गैर कृषकों को जमीन हस्तांतरित नहीं की जा सकती है। भूमि खरीदने के लिए हिमाचल प्रदेश में कृषक होना जरूरी है। हिमाचल का गैर-कृषक भी राज्य में जमीन नहीं खरीद सकता। उत्तराखंड में भी हिमाचल की इसी व्यवस्था का हवाला देकर स्थानीय व्यक्तियों के भूमि संबंधी हित सुरक्षित रखने की पैरोकारी की जा रही है।

-गणेश गोदियाल (अध्यक्ष उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी) का कहना है कि भूमि कानून में संशोधन कर सरकार ने राज्यवासियों की मुश्किल बढ़ाई हैं। भूमि पर उसके हक-हकूक प्रभावित हो रहे हैं। कृषि भूमि की प्रदेश में कमी है। इसकी खरीद-फरोख्त कर दुरुपयोग किया जा रहा है। इससे भविष्य में गंभीर खतरा पैदा होने जा रहा है।

-मदन कौशिक (अध्यक्ष उत्तराखंड भाजपा) का कहना है कि राज्य हित और जनता की मांग को देखते हुए भू-कानून पर पुनर्विचार चल रहा है। भाजपा और उसकी सरकार जन हितों को लेकर हमेशा सतर्क रही है। सरकार इस मामले में उच्च स्तरीय समिति का गठन कर चुकी है। समिति की रिपोर्ट मिलने का इंतजार है।

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