देहरादून शहर का बदला भूगोल, लेकिन सूरत वही; पढ़‍िए पूरी खबर

वोटबैंक का लालच कहें या कुछ और। अप्रैल-2018 में भाजपा सरकार ने शहर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे का हवाला देते हुए 72 गांवों को नगर निगम सीमा क्षेत्र में शामिल कर शहर का भूगोल तो बदल दिया।

Sumit KumarThu, 28 Oct 2021 03:21 PM (IST)
नगर निगम का दायरा 60 वार्ड से बढ़कर 100 वार्ड हो चुका है।

अंकुर अग्रवाल, देहरादून। वोटबैंक का लालच कहें या कुछ और। अप्रैल-2018 में भाजपा सरकार ने शहर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे का हवाला देते हुए 72 गांवों को नगर निगम सीमा क्षेत्र में शामिल कर शहर का भूगोल तो बदल दिया, लेकिन इन क्षेत्रों की तस्वीर बदलने पर न सरकार का ध्यान गया, न ही नगर निगम दे रहा। नगर निगम का दायरा 60 वार्ड से बढ़कर 100 वार्ड हो चुका है। पूर्व में शहर का क्षेत्रफल 64 वर्ग किमी था जबकि मौजूदा क्षेत्रफल 194 वर्ग किमी हो चुका है।

2011 की जनगणना के अंतर्गत निगम क्षेत्र की आबादी 5.74 लाख थी, जो अब बढ़कर 10 लाख हो चुकी है। जो मकसद शहर में गांवों को शामिल करने का था, वह कोसों दूर नजर आ रहा। इनमें न तो सफाई व्यवस्था के पुख्ता प्रबंध किए गए, न ही स्ट्रीट लाइटों पर ध्यान दिया जा रहा। नालियों व गलियों के निर्माण की बात तो दूर की है। डोर-टू-डोर कूड़ा उठान की सेवा भी इसी साल शुरू हो पाई है, लेकिन वह भी लड़खड़ाते हुए चल रही।

यह था मकसद

परिसीमन के बाद करीब सवा दो लाख ग्रामीणों को शहरी नागरिक का दर्जा मिल गया। गांवों को शहर में मिलाने का निगम का प्रस्ताव पांच साल तक सरकार में धूल फांकता रहा। हालांकि, उसमें शहर से सटे 51 गांव शामिल किए जाने थे, लेकिन बाद में यह संख्या बढ़ाकर 72 कर दी गई और मौजूदा सरकार ने प्रस्ताव मंजूर कर लिया। अब तक इन 72 गांवों को न तो शहरी क्षेत्र के करीब होने का फायदा मिल पाता था न ही ग्रामीण क्षेत्रों को मिलने वाली योजनाओं का। निगम इन्हें अपना हिस्सा नहीं मानता था जबकि ग्राम पंचायतें इन्हें शहरी क्षेत्र का हिस्सा मानकर विकास कार्य से कदम पीछे खींच लेती थी। ये क्षेत्र अभी भी सफाई व स्ट्रीट लाइट से वंचित हैं।

पीएमओ में लगाते हैं गुहार

सुविधाओं से वंचित शहरी क्षेत्र से सटे गांवों के लोग अकसर प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ में संपर्क कर अपनी समस्या बताते हैं। जोहड़ी गांव, मालसी, अनारवाला गांव में स्ट्रीट लाइटों व सड़कों की समस्या का समाधान भी पीएमओ के दखल देने के बाद संभव हुआ।

300 करोड़ चाहिए सालाना बजट

परिसीमन से पूर्व में नगर निगम से पास 60 वार्डों के लिए सालाना डेढ़ सौ करोड़ रुपये के बजट की व्यवस्था थी, मगर अब वार्डों की संख्या बढ़ जाने से नए जुड़े क्षेत्रों में विकास के लिए निगम को 150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट चाहिए। खुद नगर आयुक्त शासन में 300 करोड़ के सालाना बजट की डिमांड कर चुके हैं।

बदल गया वार्डों का गणित

परिसीमन के बाद शहर के 80 प्रतिशत वार्डों का इतिहास-भूगोल बदल चुका है। वार्डों का परिसीमन करीब आठ हजार की आबादी के हिसाब से किया गया है। ऐसे में शहर के 45 वार्ड, जिनकी आबादी नौ हजार से अधिक थी, उनकी स्थिति में भी परिवर्तन आ गया है। इतना ही नहीं ऐसे वार्ड भी प्रभावित हुए हैं, जिनकी आबादी नौ हजार से कम थी।

निगम के लिए भी बड़ी चुनौती

72 गांवों के शामिल होने से नगर निगम के लिए भी चुनौती बढ़ गई है। दरअसल, 2008 में जब सीमा विस्तार कर 18 गांव निगम क्षेत्र में शामिल किए गए थे, उन्हीं में अब तक मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। निगम के पास भी सीमित संसाधन हैं। साठ वार्डों की व्यवस्था संभालने में नगर निगम प्रशासन नाकाम साबित हो रहा था, ऐसे में नए वार्ड बढऩे से निगम प्रशासन का ध्यान इनकी तरफ जा ही नहीं रहा।

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निगम के वर्तमान बजट की स्थिति

60 वार्ड के हिसाब से निगम के पास थी 150 करोड़ के बजट की व्यवस्था। मौजूदा समय में निगम का सालाना बजट है 176 करोड़ रुपये। नगर निगम क्षेत्र में शामिल 72 गांवों में विकास कार्यों के लिए 150 करोड़ का बजट अतिरिक्त चाहिए। 14 वें वित्त आयोग से नगर निगम को मिलते हैं 101 करोड़ रुपये। केंद्र वित्त आयोग से 25 करोड़ रुपये सालाना मिलते हैं। भवन कर, फड़-ठेली शुल्क और अन्य मदों में उसकी आय फिलहाल 55 करोड़ रुपये है।

महापौर सुनीन उनियाल गामा का कहना है कि कोरोना के कारण पिछले डेढ़ साल में निगम की आय बेहद प्रभावित हुई है, मगर नए वार्डों में विकास कार्यों के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा रहा। हर वार्ड को बराबर धनराशि विकास कार्यों के लिए आवंटित की जा रही। सफाई व्यवस्था पहले के मुकाबले बेहद सुधरी है व स्ट्रीट लाइटें भी लग रहीं। जल्द ही नए वार्डों की सूरत बदली नजर आएगी।

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