एक किलो चावल उत्पादन में 25 सौ लीटर पानी की आवश्यकता, कृषि विज्ञानियों ने किसानों को दिए और भी टिप्स

एक किलो चावल उत्पादन के लिए फसल में 25 सौ लीटर पानी की आवश्यकता होती है। पानी की अधिक जरूरत के कारण ही धान की रोपाई बरसात में की जाती है। कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के विज्ञानी ने किसानों को धान के बेहतर उत्पादन के टिप्स दिए हैं।

Raksha PanthriMon, 14 Jun 2021 03:39 PM (IST)
एक किलो चावल उत्पादन में 25 सौ लीटर पानी की आवश्यकता।

जागरण संवाददाता, विकासनगर। एक किलो चावल उत्पादन के लिए फसल में 25 सौ लीटर पानी की आवश्यकता होती है। पानी की अधिक जरूरत के कारण ही धान की रोपाई बरसात में की जाती है। कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के विज्ञानी ने किसानों को धान के बेहतर उत्पादन के टिप्स दिए हैं।

धान को गेहूं के बाद मुख्य फसल चक्र में उगाया जाता है। दोनों ही फसलों में खेत से एक ही प्रकार के पोषक तत्वों का दोहन बहुत अधिक मात्रा में हो जाता है। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता नहर और ट्यूबवेल पर निर्भर है, जिसके कारण भूगर्भ जल का स्तर भी काफी नीचे चला जा रहा है। यदि किसान ऐसी प्रजातियों का चयन करें जो 110 से लेकर 125 दिन की अवधि में पक कर तैयार हो जाती हैं तो उनकी रोपाई करने का उचित समय जुलाई प्रथम पखवाड़ा रहता है। जब तक यहां पर मानसून की बारिश होना प्रारंभ हो जाती हैं, लेकिन वर्तमान में किसान 135 से लेकर 150 दिन अवधि वाली धान की किस्मों को बो रहे हैं, वह मानसून से काफी पहले लगभग जून के मध्य में रोपाई करने लगते हैं जो हमारे इन क्षेत्रों में बिल्कुल भी अनुकूल समय नहीं है।

कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के विज्ञानी डा. संजय सिंह ने बताया कि ऐसा करने से खेत में रोपाई के बाद धान की पौध खराब हो जा रही है, कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है। विज्ञानी दृष्टिकोण से किसानों को यह सलाह है कि किसान नत्रजन के साथ-साथ दूसरे आवश्यक पोषक तत्व भी अवश्य प्रयोग करें। नत्रजन के विकल्प के रूप में धान की फसल में नीम की खली के साथ यूरिया को मिलाकर प्रयोग किया जाना अच्छा रहता है। खड़ी फसल में प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोल बनाकर आधा लीटर नैनो यूरिया का छिड़काव किया जाना बहुत ही उत्तम माना गया है, इससे यूरिया की भी बचत होगी और बहते हुए जल को दूषित होने से बचाया जा सकेगा। किसानों को यह भी सलाह दी जाती है कि उचित समय पर ही धान की रोपाई का कार्य करें।

धान की प्रजातियां

कृषि विज्ञानी डा. संजय सिंह ने बताया कि कम अवधि में पकने वाली धान की प्रमुख प्रजातियां डीआरएच 834, शरबती, यूएस 312, गोविंद, पंत धान 11 व पूसा 1509 हैं। 135 से लेकर 150 दिन में पकने वाली प्रजातियों में मुख्य रूप से बांसमती धान की टाइप तीन बासमती 370 तरावड़ी हैं, मोटे धान की नरेंद्र 359, पीआर 126, पीआर 124, पीआर 127 है। ये सभी किस्में लंबी अवधि की हैं, जबकि संकर धान की अराइज 6444, वर्षा गोल्ड 4044 आदि भी यहां की जलवायु में उपयुक्त है। धान की रोपाई करते समय किसी भी दानेदार कीटनाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब हम कीटनाशक का छिड़काव खेत में करते हैं तो वह किसी कीट के संभावित प्रकोप से बचने के लिए होना चाहिए। रोपाई के समय न तो कोई कीट भूमि में जड़ों के आस पास होता है और न ही रोपाई किए जाने वाले धान में आने की आशंका रहती है। रोपाई के समय धान की स्वस्थ पौध को प्रति लीटर पानी में 5-5 ग्राम ट्राइकोडरमा व स्यूडोमोनास का घोल बनाकर लगभग 20 मिनट तक जड़ों को दबाकर रखें, तत्पश्चात खेत में रोपाई करें।

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