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बीआरओ ने सीमा क्षेत्र में आसान की सेना की राह, अंतिम चौकियां भी जुड़ी सड़क से

चमोली, देवेंद्र रावत। सर्दी हो या गर्मी, बर्फ हो या बारिश, श्रम से हर परिस्थिति को साधा जा सकता है। इसीलिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) का सूत्र वाक्य है 'श्रमेव सर्वसाध्य'। इसी ध्येय के साथ बीआरओ के जवान सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना की राह आसान बनाने में जुटे हैं। उनकी कड़ी मेहनत का ही नतीजा है कि चमोली जिले के चीन सीमा से लगे क्षेत्र की अंतिम चौकियां भी अब पक्की सड़क से जुड़ गई हैं। सरहद की सुरक्षा में जितना योगदान सेना और अर्धसैनिक बलों का है, उतना ही बीआरओ का भी। हालांकि, सीमा पर उसकी भूमिका की चर्चा कम ही होती है। 

लद्दाख की गलवन घाटी में चीनी घुसपैठ के बाद उत्तराखंड में भी चमोली जिले का सीमांत क्षेत्र संसाधनों को लेकर चर्चा में है। सीमा क्षेत्र में सेना की आवाजाही के लिए पक्की सड़क बन चुकी हैं। इससे न सिर्फ सेना, बल्कि रसद व सैन्य उपकरणों की भी सीमा तक पहुंच आसान हुई है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी, बारिश और भूस्खलन से सड़कों का क्षतिग्रस्त होना और पुलों का बह जाना सामान्य बात है। लेकिन, बीआरओ हर परिस्थिति में सीमावर्ती क्षेत्र में सड़क निर्माण के साथ उनके रखरखाव के काम में भी तत्पर है। बीते दस सालों में चीन से लगे उत्तराखंड के 345 किमी क्षेत्र में तेजी से मूलभूत सुविधाएं विकसित हुई हैं। ग्रामसभा मलारी के प्रधान राय सिंह बताते हैं कि चमोली जिले में भी 88 किमी सीमा क्षेत्र में माणा व नीती पास की अंतिम चैक पोस्टों तक सड़क पहुंच चुकी है। 

अंतिम पोस्ट बाड़ाहोती तक पहुंची सड़क 

जोशीमठ से मलारी तक बीआरओ ने 60 किमी डबल लेन पक्की सड़क बना दी है। यहां से एक सड़क सुमना से रिमखिम होते हुए अंतिम सुरक्षा पोस्ट बाड़ाहोती तक जाती है। 40 किमी लंबी यह सड़क कहीं डबल तो कहीं सिंगल लेन है। सड़क का बड़ा हिस्सा डामरीकृत हो चुका है। इस मार्ग पर भी मलारी से आगे बिना अनुमति के आम लोग आवाजाही नहीं कर सकते। दूसरा मोटर मार्ग मलारी से 20 किमी आगे नीती गांव तक जाता है। यह सड़क नीती तक वर्ष 2006 में बनी थी। अब नीती से 40 किमी सड़क नीती पास के लिए बनी है। यहां पर देश की अंतिम रक्षा चौकी ग्याल्डुंग सहित अन्य सीमा चौकियां सड़क मार्ग से जुड़ चुकी हैं। यह सड़क भी कहीं डबल तो कहीं सिंगल लेन है, जिसका बड़ा हिस्सा डामरीकृत हो चुका है।

1962 में सीमा क्षेत्र में था सड़कों का अभाव 

वर्ष 1962 में चमोली जिले के सीमा क्षेत्र में सड़कों का अभाव था। तब हाइवे चमोली के पास पीपलकोटी तक ही बना था। यहां से आगे पैदल आवाजाही होती थी। गमशाली निवासी चंद्रमोहन फोनिया बताते हैं कि वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में भोटिया जनजाति के लोगों ने पीपलकोटी से नीती-माणा बॉर्डर तक सेना का सामान पहुंचाने में अपने घोड़े-खच्चर व बकरियों के जरिये मदद की थी। वर्तमान में सीमांत क्षेत्र के लौंग, गरपक, द्रोणागिरी आदि गांव सड़क सुविधा से वंचित हैं। हालांकि, अब इन्हें भी सड़क से जोड़ने की कवायद तेज हो गई है।

बीआरओ पर एक नजर बीआरओ 

देश ही नहीं, मित्र देशो में भी सड़क का निर्माण करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1960 में हुई थी। तब से बीआरओ सीमा क्षेत्रों में सड़कें बनाकर देश रक्षा में अहम भूमिका निभा रहा है। संगठन मित्र देशों में भी सड़क निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।

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गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत का  कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्र को सड़क सुविधा से जोड़ने और बेहतर यातायात सुविधाएं मुहैया कराने की मंशा का ही नतीजा है कि नीती घाटी व माणा पास की सभी सीमा चौकी सड़क से जुड़ चुकी हैं। इन सड़कों का चौड़ीकरण और हॉटमिक्स से डामरीकरण भी तेजी से हो रहा है। केंद्र सरकार की मंशा है कि सीमावर्ती क्षेत्र में सड़कों का जाल बिछाकर मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाए।

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