पहाड़ी उत्पाद से हरीश ने पलायन करने वालों को दिखाई राह

पहाणी उत्पाद से हरीश ने पलायन करने वालो को राह दिखाई है।

JagranSun, 19 Sep 2021 10:26 PM (IST)
पहाड़ी उत्पाद से हरीश ने पलायन करने वालों को दिखाई राह

दीप सिंह बोरा, अल्मोड़ा। नया करने का जज्बा और माटी का मोह महानगरीय चकाचौंध पर भारी पड़ा। तभी तो दिल्ली में मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ मुनियाधारा डोल निवासी हरीश बहुगुणा गांव लौटे। पुश्तैनी परती पड़ी जमीन को सींच औषधीय खेती के जरिये बेरोजगारी से जूझने की ठानी। इसके साथ ही वन क्षेत्रों में उपेक्षित पौष्टिक फर्न लिंगुड़ा, जंगली आंवला, काठी अखरोट व कचनार के फूलों से तैयार उत्पादों में रोजगार की महक भी तलाश ली। सालभर की मेहनत अब रंग लाने लगी है। उनके उत्पाद देश- विदेश तक पहुंचने लगे हैं। हरीश की इस पहल ने पलायन करने वालों को पहाड़ पर ही बेहतर करने की राह सुझाई है।

मुलियाधारा डोल गांव (लमगड़ा ब्लॉक) के हरीश बहुगुणा ने एसएसजे कैंपस अल्मोड़ा से लॉ प्रथम सेमेस्टर की पढ़ाई के बाद 1997 में पहाड़ छोड़ दिया। दिल्ली में कई नामी गिरामी कंपनियों में नौकरी की। बीते वर्ष लॉकडाउन में पहाड़ लौटे। औषधीय वनस्पतियों व जंगल से लगाव था तो प्राकृतिक संसाधनों से ही जिंदगी संवारने की सोची। पलायन से बेजार जमीन को दोबारा खेती के लिए तैयार किया। बीते जुलाई-अगस्त में औषधीय प्रजातियों की खेती शुरू की। लगे हाथ खाद्य प्रसंस्करण, कृषि एवं बागवानी व्यवसाय की योजना को आगे बढ़ाया। राजस्थान व गुजरात तक पहुंचा अचार

हरीश ने वन क्षेत्रों में उपेक्षित फर्न लिंगुड़ा का अचार बनाना शुरू किया। इसके साथ ही पहाड़ी मेथी दाना, कचनार, सेब व नाशपाती के भी उत्पाद बनाए। दोस्तों से साझा किया तो गुजरात व राजस्थान के मारवाड़ तक अचार पहुंचने लगा। हरीश ने 200 ग्राम से दो किलो के पैक बनाए हैं। 200 से 225 रुपये प्रति किलो की दर से अब तक वह 800 किलो अचार बेच चुके हैं। मधुमेवा भी भाने लगा

हरीश ने जंगली काठी अखरोट, खुबानी के साथ ही कम बिकने वाले पर्वतीय सेब, तुलसी, अंगूर व कद्दू के बीज का मिश्रण तैयार कर पौष्टिक मधुमेवा भी बनाया। जायका बढ़ाने के लिए वह बादाम, काजू की गिरी भी मिलाते हैं। 800 ग्राम का पैक एक हजार रुपये में ऑनलाइन बिक भी रहा है।

खुबानी के पेड़े व आंवले के लड्डू भी

पहाड़ी फल खुबानी के पेड़े व जंगली आंवला के लड्डू बनाने का अभिनव प्रयोग भी सफल रहा। दोनों उत्पाद 500-300 रुपये प्रति किलो तक बिक रहे हैं। इसमें वह भैंस का घी, पहाड़ में बहुतायत में उगने वाली सतावरी, नागौर राजस्थान का अश्वगंधा मिला रहे हैं। जंगली आंवला की कैंडी भी पसंद की जा रही है। वर्जन

'पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनों व उनका महत्व समझने की जरूरत है। उत्पादों को लंबे समय तक ताजा रखने के लिए एसिटिक एसिड या अन्य रसायनों के बजाय जैविक रूप से नींबू रस व खांड इस्तेमाल करता हूं। अभी गौलापार मौन पालन विभाग से शहद ले रहे हैं। जल्द ही कनरा व ठाठ गांव में मौन पालन इकाई स्थापित करने की योजना है। लमगड़ा में स्थानीय महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए औद्योगिक इकाई लगाने जा रहे हैं। उद्यान विभाग से महिलाओं को सात दिनी प्रशिक्षण भी दिलाया है।

-हरीश बहुगुणा

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