विश्व पर्यटन दिवस 2020 : कह रही है अपनी काशी, टूटकर रहेगी कोरोना काल की यह उदासी

1980 से 27 सितंबर को 'विश्‍व पर्यटन दिवस' के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया था।
Publish Date:Sat, 26 Sep 2020 08:33 PM (IST) Author: Abhishek Sharma

वाराणसी [अभिषेक शर्मा]। विश्‍व पर्यटन के मानचित्र पर अविनाशी काशी सदियों से दैदीप्‍यमान रही है। विदेशी पर्यटक हजारों सालों से भगवान शिव की नगरी काशी में आते रहे हैं। उस दौर की किताबों में काशी की महिमा चीनी यात्रियों ह़वेनसांग और फाहयान से लेकर आधुनिक दौर में विदेशी प्रधानमंत्रियों और राष्‍ट्रपतियों की काशी यात्रा इस बात की गवाही देती है कि उत्‍सवधर्मी काशी में पर्यटन का दौर कोरोना काल भ्‍ाी भले ही थमा हो मगर जीवंत नगरी काशी एक बार फ‍िर से अनलॉक के बाद उठ खड़ी हुई है और जल्‍द ही काश्‍ाी में उत्‍सवों और लक्‍खा मेलों की अनगिन आयोजनों की श्रंखला पर्यटन की उदासी भी दूर कर देगा। वहीं वर्ष 2020 को ग्रामीण समुदायों को केंद्रित करके ग्रामीणों को रोजगार दिलाने और आर्थिक सशक्तिकरण प्रदान करने की मंशा पर केंद्रित किया गया है। वैसे भी संगीत को लेकर वाराणसी यूनेस्‍को के हेरिटेज सिटी में शामिल है।

घाट के नजर आने लगे ठाट

अनलॉक घोषित होने के बाद से ही काशी में पर्यटन अब धीरे धीरे पटरी पर लौटने लगा है। काशी के ठाट को देखना हो तो गंगा घाटों से बेहतर और कुछ नहीं। 84 घाटों की अपनी अलग महिमा और अलग इतिहास है। लाॅकडाउन के दौरान भी यहां मणिकर्णिका घाट और हरिश्‍चंद्र घाट पर चिताओं की आंच कभी ठंडी नहीं पड़ी। अलबत्‍ता गंगा आरती भी बिना श्रद्धालुओं के अनवरत चलती रही। बस गंगा की लहरों पर पर्यटन की सवारी थम गई थी जो 17 सितंबर को बाढ़ की समाप्ति के बाद दोबारा से गंगा में पर्यटन परवाज भरने लगा है। विश्‍व पर्यटन दिवस के दिन से ही काशी का पहला क्रूज भी गंगा में शाम को पर्यटकों को गंगा की मौजों पर सवारी कराने को तैयार है।

धार्मिक पर्यटन के लिए बड़ा नाम

काशी धार्मिक पर्यटन के लिए एक जाना पहचाना ही नहीं बल्कि बड़ा नाम भी है। सरकार ने काशी की पहचान को बनाए रखने के लिए इस बार से मंडुअाडीह रेलवे स्‍टेशन का भी नाम बनारस करने के साथ ही काशी, बनारस और वाराणसी नाम को प्रचारित और प्रसारित कर रहा है। भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्‍थली सारनाथ भी यहीं होने की वजह से विश्‍व भर के बौद्ध धर्मावलंबी पर्यटक सारनाथ आना नहीं भूलते साथ ही बौद्ध सर्किट में श्‍ाामिल होने की वजह से भी काशी में पर्यटकों का आगमन होता रहा है। जबकि द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्‍वनाथ दरबार में आस्‍था का रेला वर्षभर बना रहता है। ऐसे में बनारस आने वालों के लिए संकटमोचन सहित जैन धर्म और कबीर पंथियों के अलावा सीर गोवर्धन में रैदासियों का भी विश्‍व भर से जमावड़ा होता रहा है।

यातायात के सुगम साधन

वाराणसी विमान सेवा, जल सेवा, रेल और सड़क मार्ग के माध्‍यम से विश्‍व भर से जुड़ा हुआ है। लाल बहादुर शास्‍त्री अंतरराष्‍ट्रीय एयरपोर्ट बाबतपुर विश्‍व से विमान सेवाओं से जुड़ा हुआ है। जबकि नेशनल वाटर वे के जरिए वाराणसी कोलकाता से गंगा के जरिए जुड़ा हुआ है। अमूमन प्रत्‍येक वर्ष राजमहल क्रूज पर सवार होकर कोलकाता से काशी तक पर्यटक जल मार्ग से वाराणसी अाते हैं। जबकि एनएच 2 सहित पूर्वांचल एक्‍सप्रेस वे से भी वाराणसी जल्‍द जुड़ जाएगा। वहीं रेल मार्ग से पूरे देश से वाराणसी जुड़ा हुआ है। ऐसे में पर्यटन के लिहाज से वाराणसी में सभी प्रकार की सहूलियतें हासिल हैं। पीएम नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने की वजह से भी काशी शासन और प्रशासन के लिए विकास का प्रमुख केंद्र है।

वर्ष 1970 से शुरु हुई थीम की परंपरा

संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से वर्ष 1980 से 27 सितंबर को 'विश्‍व पर्यटन दिवस' के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया था। प्रत्‍येक वर्ष इसके लिए थीम आधारित वर्ष घोषित कर वैश्विक पर्यटन की तैयारियाें को अंजाम देने के लिए 'विश्व पर्यटन संगठन' का संविधान स्वीकार किया गया था। इस वर्ष की थीम 'पर्यटन और ग्रामीण विकास' घोषित किया गया है। विश्व पर्यटन दिवस मनाने के पीछे का उददेश्‍य यह था कि पर्यटन दिवस के महत्व के साथ ही प्रत्‍येक वर्ष आम जन को विभिन्न तरीकों से जागरूक करने को अलग-अलग थीम रखा जाए। काशी के लिहाज से देखें तो लमही जैसा गांव आज मुंशी प्रेमचंद की वजह से अपनी विशिष्‍ट पहचान रखता है। वहीं दूर दराज के गांवों की भी अपनी अपनी महिला और पौराणिक महत्‍ता होने की वजह से वर्ष भर पर्यटकों से गुलजार रहता है। ऐसे में 'पर्यटन और ग्रामीण विकास' थीम को काशी काफी बेहतर तरीके से चरितार्थ कर सकती है। हस्‍तशिल्‍प उत्‍पादों को लेकर काशी का विश्‍व भर में नाम है ऐसे में ग्रामीण पर्यटन काश्‍ाी का लंबे समय से एक अलग हिस्‍सा ही रहा है।

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